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Friday, October 3, 2008

सफ़र में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो

किसीके वासते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो

यहाँ किसीको कोई रासता नहीं देता
मुझे गिराके अगर तुम सम्भल सको तो चलो

यही है ज़िंदगी, कुछ ख़ाक चंद उम्मीदें
इन्ही खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Sunday, September 28, 2008

जब नाम तेरा प्यार से लिखती हैं उंगलियाँ
मेरी तरफ़ ज़माने की उठती हैं उंगलियाँ

दामन सनम का हाथ में आया था एक पल
दिन-रात उस ही पल से महकती हैं उंगलियाँ

जिस दिन से दूर हो गए उस दिन से ही सनम
बस दिन तुम्हारे आने की गिनती हैं उंगलियाँ

पत्थर तराशकर न बना ताज एक नया
फ़नकार की जहाँ में कटती हैं उंगलियाँ
हम को दुश्मन की निगाहों से न देखा कीजिये
प्यार ही प्यार हैं हम, हम पे भरोसा कीजिये

चंद यादों के सिवा हाथ न कुछ आयेगा
इस तरह उम्र-ए-गुज़रा का न पीछा कीजिये

रोश्नी औरों के आँगन में गवारा न सही
कम से कम अपने ही घर में तो उजाला कीजिये

क्या ख़बर कब वो चले आयेंगे मिलने के लिये
रोज़ पल्कों पे नई शम्में जलाया कीजिये

Thursday, September 25, 2008

कांटों की चुभन पायी, फूलों का मज़ा भी
दिल दर्द के मौसम में, रोया भी हँसा भी

आने का सबब याद, न जाने की खबर है
वो दिल में रहा और उसे तोड़ गया भी

हर एक से मंज़िल का पता पूछ रहा है
गुम्राह मेरे साथ हुअ राह्नुमा भी

गुमनाम कभी अपनो से जो ग़म हुए हासिल
कुछ याद रहे उन में तो कुछ भूल गया भी
जब नाम तेरा प्यार से लिखती हैं उंगलियाँ
मेरी तरफ़ ज़माने की उठती हैं उंगलियाँ

दामन सनम का हाथ में आया था एक पल
दिन-रात उस ही पल से महकती हैं उंगलियाँ

जिस दिन से दूर हो गए उस दिन से ही सनम
बस दिन तुम्हारे आने की गिनती हैं उंगलियाँ

पत्थर तराशकर न बना ताज एक नया
फ़नकार की जहाँ में कटती हैं उंगलियाँ