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Saturday, October 4, 2008

हम से आया न गया तुम से बुलाया ना गया
फ़ासला प्यार में दोनों से मिटाया ना गया

वो घड़ी याद है जब तुम से मुलाक़ात हुई
एक इशारा हुआ दो हाथ बढ़े बात हुई
देखते देखते दिन ढल गया और रात हुई
वो समां आज तलक दिल से भुलाया ना गया
हम से आया न गया

क्या ख़बर थी के मिले हैं तो बिछड़ने के लिये
क़िस्मतें अपनी बनाईं हैं बिगड़ने के लिये
प्यार का बाग बसाया था उजड़ने के लिये
इस तरह उजड़ा के फिर हम से बसाया ना गया
हम से आया न गया

याद रग जाती है और वक़्त गुज़र जाता है
फूल खिलता है मगर खिल के बिखर जाता है
सब चले जाते हैं फिर दर्दे जिगर जाता है
दाग़ जो तूने दिया दिल ने मिटाया ना गया
हम से आया न गया ...
दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है

हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही, ये माजरा क्या है

मैं भी मुह में ज़ुबान रखता हूँ
काश पूछो की मुद्द क्या है

जबकि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है

ये परी-चेहरा लोग कैसे हैं
ग़मज़ा-ओ-उश्‍वा-ओ-अदा क्या है

शिकने-ज़ुलफ़े-अमबरी क्या है
निगाहे-चश्मे-सुरम सा क्या है

सब्ज़-ओ-गुल कहाँ से आये हैं
अब्र क्या चीज़ है, हवा क्या है

हमको उनसे वफ़ा कि है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

हाँ भला कर, तेरा भला होगा
और दरवेश की सदा क्या है

जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है

मैने माना कि कुछ नहीं ``ग़ालिब''
मुफ़्त हाथ आये, तो बुरा क्या है
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
ग़म की दुनिया से दिल भर गया
ढूँढ ले अब कोई घर नया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल

चल जहाँ गम के मारे न हों
झूठी आशा के तारे न हों
झूठी आशा के तारे न हों
इन बहारों से क्या फ़ायदा
जिस में दिल की कली जल गई
ज़ख़्म फिर से हरा हो गया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल

चार आँसू कोई रो दिया
फेर के मुँह कोई चल दिया
फेर के मुँह कोई चल दिया
लुट रहा था किसी का जहाँ
देखती रह गई ये ज़मीं
चुप रहा बेरहम आसमां
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
सुरमैइ रात है सितारे हैं
आज दोनों जहाँ हमारे हैं

सुबह का इंतेज़ार कौन करे 
सुबह का इंतेज़ार कौन करे

फिर यह रुत यह समा मिले न मिले
आर्ज़ू का चमन खिले न खिले
वक़्त का ऐतबार कौन करे
सुबह का इंतेज़ार कौन करे

ले भी लो हम को अपनी बाहों में
रूह बेचैन है निगाहों में
इल्तेजा बार बार कौन करे
सुबह का इंतेज़ार कौन करे

नई रात ढलती जाती है
रूह ग़म से पिघलती जाती है

तेरी ज़ुल्फ़ों से प्यार कौन करे
अब तेरा इंतज़ार कौन करे

तुम को अपना बना के देख लिया
एक बार आज़मा के देख लिया
बार बार ऐतबार कौन करे
अब तेरा इंतज़ार कौन करे

ऐ दिल-ए-ज़ार सोग़वार न हो
उनकी चाहत में बेक़रार न हो
हाय, बदनसीबों से प्यार कौन करे
अब तेरा इंतज़ार कौन करे

Friday, October 3, 2008

आँखों में मस्ती शराब की
काली ज़ुल्फ़ों में आँहें शबाब की
जाने आई कहाँ से टूटके
मेरे दामन में पंखुड़ी गुलाब की

चांद का टुकड़ा कहूँ या, हुस्न की दुनिया कहूँ
प्रीत की सरगम कहूँ या, प्यार का सपना कहूँ
सोचता हूँ, क्या कहूँ, सोचता हूँ, क्या कहूँ
इस शोख़ को मैं क्या कहूँ

चाल कहती है न हो, पहली घटा बरसात की
हर अदा अपनी जगह, तारीफ़ हो किस बात की
आरज़ू कितने दिनों से, आरज़ू कितने दिनों से
थी हमें इस रात की

Thursday, September 25, 2008

तसवीर तेरी दिल मेरा बहला न सकेगी
ये तेरी तरह मुझ से तो शर्मा न सकेगी
तसवीर तेरी ...

मैं बात करूँगा तो ये खामोश रहेगी
सीने से लगा लूँगा तो ये कुछ न कहेगी
आराम वो क्या देगी जो तड़पा न सकेगी
तसवीर तेरी ...

ये आँखें हैं ठहरी हुई चंचल वो निगाहें
ये हाथ हैं सहमे हुए और मस्त वो बाहें
पर्छाईं तो इंसान के काम आ न सकेगी
तसवीर तेरी ...

इन होंठों को फ़ैय्याज़ मैं कुछ दे न सकूँगा
इस ज़ुल्फ़ को मैं हाथ में भी ले न सकूँगा
उलझी हुई रातों को ये सुलझा न सकेगी
तसवीर तेरी ...