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Tuesday, November 4, 2008

यह न सोचो कल क्या हो
कौन कहे इस पल क्या हो

रोओ मत, न रोने दो
ऐसी भी जल-थल क्या हो

बहती नदी की बांधे बांध
चुल्लू मे हलचल क्या हो

हर छन हो जब आस बना
हर छन फ़िर निर्बल क्या हो

रात ही गर चुपचाप मिले
सुबह फ़िर चंचल क्या हो

आज ही आज की कहें-सुने
क्यो सोचे कल, कल क्या हो

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली

जितना-जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली


रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी

आँखें हँस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली


जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज सुनी

जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली


मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर

दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली


होंठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे

जलती-बुझती आँखों में, सादा सी जो बात मिली

पूछते हो तो सुनो, कैसे बसर होती है

रात खैरात की, सदके की सहर होती है


साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब

दिल ही दुखता है, न अब आस्तीं तर होती है


जैसे जागी हुई आँखों में, चुभें काँच के ख्वाब

रात इस तरह, दीवानों की बसर होती है


गम ही दुश्मन है मेरा गम ही को दिल ढूँढता है

एक लम्हे की ज़ुदाई भी अगर होती है


एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती खुशबू

कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है


दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ

बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है


काम आते हैं न आ सकते हैं बेज़ाँ अल्फ़ाज़

तर्ज़मा दर्द की खामोश नज़र होती है

यूँ तेरी रहगुज़र से दिवानावर गुज़रे

काँधे पे अपने रख़ के अपना मजा़र गुज़रे


बैठे रहे हैं रास्ता में दिल का खानदार सजा़ कर

शायद इसी तरफ़ से एक दिन बहार गुज़रे


बहती हुई ये नदिया घुलते हुए किनारे

कोई तो पार उतरे कोई तो पार गुज़रे


तू ने भी हम को देखा हमने भी तुझको देखा

तू दिल ही हार गुज़रा हम जान हार गुज़रे

आगाज़ तॊ होता है अंजाम नहीं होता

जब मेरी कहानी में वॊ नाम नहीं होता

जब जुल्फ़ की कालिख़ में घुल जाए कोई राही

बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं हॊता

हँस हँस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकडे़

हर शख्स़ की किस्मत में ईनाम नहीं होता

बहते हुए आँसू ने आँखॊं से कहा थम कर

जो मय से पिघल जाए वॊ जाम नहीं होता

दिन डूबे हैं या डूबे बारात लिये कश्ती

साहिल पर मगर कोई कोहराम नहीं होता

ये रात ये तन्हाई

ये दिल के धड़कने की आवाज़


ये सन्नाटा

ये डूबते तारॊं की


खा़मॊश गज़ल खवानी

ये वक्त की पलकॊं पर


सॊती हुई वीरानी

जज्बा़त ऎ मुहब्बत की


ये आखिरी अंगड़ाई

बजाती हुई हर जानिब


ये मौत की शहनाई

सब तुम कॊ बुलाते हैं


पल भर को तुम आ जाओ

बंद होती मेरी आँखों में


मुहब्बत का

एक ख्वाब़ सजा जाओ

चाँद तन्हा है आसमां तन्हा,

दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा

बुझ गई आस छुप गया तारा,

थरथराता रहा धुँआ तन्हा

जिंदगी क्या इसी को कहते हैं,

जिस्म तन्हा है और जान तन्हा

हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी,

दोनों चलते रहें तन्हा तन्हा

जलती बुझती सी रोशनी के परे,

सिमटा सिमटा सा एक मकां तन्हा

राह देखा करेगा सदियॊं तक

छॊड़ जाएगें ये जहाँ तन्हा

मेरा माज़ी
मेरी तन्हाई का ये अंधा शिगाफ़
ये के सांसों की तरह मेरे साथ चलता रहा
जो मेरी नब्ज़ की मानिन्द मेरे साथ जिया
जिसको आते हुए जाते हुए बेशुमार लम्हे
अपनी संगलाख़ उंगलियों से गहरा करते रहे, करते गये
किसी की ओक पा लेने को लहू बहता रहा
किसी को हम-नफ़स कहने की जुस्तुजू में रहा
कोई तो हो जो बेसाख़्ता इसको पहचाने
तड़प के पलटे, अचानक इसे पुकार उठे
मेरे हम-शाख़
मेरे हम-शाख़ मेरी उदासियों के हिस्सेदार
मेरे अधूरेपन के दोस्त
तमाम ज़ख्म जो तेरे हैं
मेरे दर्द तमाम
तेरी कराह का रिश्ता है मेरी आहों से
तू एक मस्जिद-ए-वीरां है, मैं तेरी अज़ान
अज़ान जो अपनी ही वीरानगी से टकरा कर
थकी छुपी हुई बेवा ज़मीं के दामन पर
पढ़े नमाज़ ख़ुदा जाने किसको सिज़दा करे