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Monday, October 13, 2008

धूप के साथ गया साथ निभाने वाला
अब कहाँ आयेगा वो लौट के आने वाला

रेत पर छोड़ गया नक्श हजारों अपने
किसी पागल की तरह नक्श मिटाने वाला

सब्ज़ शाखें कभी ऐसे टू नहीं चीखती हैं 
कौन आया है परिंदों को डराने वाला

आरिज़-ऐ-शाम की सुर्खी ने किया फाश उसे
परदा-ऐ-अब्र में था आग लगाने वाला

सफर-ऐ-शब का तकाजा है मेरे साथ रहो
दस्त पुर्हौल है तूफ़ान है आने वाला 

मुझ को दर्पर्दा सुनाता रहा किस्सा अपना
अगले वक्तों की हिकायात सुनाने वाला

शबनमी घास घने फूल लाराज़ती किरणें 
कौन आया है खजानों को लुटाने वाला

अब तो आराम करें सोचती आँखें मेरी
रात का आखिरी तारा भी है जाने वाला