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Saturday, July 25, 2009

सच ये है बेकार हमें ग़म होता है
जो चाहा था दुनिया में कम होता है

ढलता सूरज फैला जंगल रस्ता गुम
हमसे पूछो कैसा आलम होता है

ग़ैरों को कब फ़ुरसत है दुख देने की
जब होता है कोई हम-दम होता है

ज़ख़्म तो हम ने इन आँखों से देखे हैं
लोगों से सुनते हैं मरहम होता है

ज़हन की शाख़ों पर अशार आ जाते हैं
जब तेरी यादों का मौसम होता है

जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया

उम्र भर दोहराऊँगा ऐसी कहानी दे गया

उस से मैं कुछ पा सकूँ ऐसी कहाँ उम्मीद थी
ग़म भी वो शायद बरा-ए-मेहरबानी दे गया

सब हवायें ले गया मेरे समंदर की कोई
और मुझ को एक करती बादबानी दे गया

ख़ैर मैं प्यासा रहा पर उस ने इतना तो किया
मेरी पलकों की कतारों को वो पानी दे गया

Tuesday, January 27, 2009

हमारे शौक़ की ये इन्तिहा थी
क़दम रखा कि मंज़िल रास्ता थी

कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है
मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी

मोहब्बत मर गई मुझको भी ग़म है
मेरे अच्छे दिनों की आशना थी

जिसे छू लूँ मैं वो हो जाये सोना
तुझे देखा तो जाना बद्दुआ थी

मरीज़े-ख़्वाब को तो अब शफ़ा है
मगर दुनिया बड़ी कड़वी दवा थी

हर ख़ुशी में कोई कमी सी है 
हँसती आँखों में भी नमी सी है 

दिन भी चुप चाप सर झुकाये था 
रात की नफ़्ज़ भी थमी सी है 

किसको समझायेँ किसकी बात नहीं 
ज़हन और दिल में फिर ठनी सी है 

ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई 
गर्द इन पलकों पे जमी सी है 

कह गए हम किससे दिल की बात 
शहर में एक सनसनी सी है 

हसरतें राख हो गईं लेकिन 
आग अब भी कहीं दबी सी है 

Friday, October 3, 2008

मिसाल इसकी कहाँ है ज़माने में
की सारे खोने के गम पाये हमने पाने में

वो शक्ल पिघली तो हर शै में ढल गई जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में

जो मुन्तजिर न मिला वो तो हम है शर्मिन्दा
की हमने देर लगा दी पलट के आने में

लतीफ था वो ताखैय्युल से, ख्वाब से नाज़ुक
गवा दिया हमने ही उसे आज़माने में

समझ लिया था कभी एक सराब को दरिया
पर एक सुकून था हमको फरेब खाने में

झुका दरख्त हवा से, तो आँधियों ने कहा
ज्यादा फर्क नहीं झुक के टूट जाने में
मैं भूल जाऊं अब यही मुनासिब है 
मगर भूलना भी चाहूँ तो किस तरह 
भूलूं की तुम तो फिर भी हकीक़त हो कोई ख्वाब नहीं
यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ
कमबख्त
भुला सका न ये सिलसिला जो था ही नहीं
वो इक ख़याल जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात जो मैं कह नहीं सका तुम से
वो एक रब्त 
वो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब
जो कभी हुआ ही नहीं
अगर ये हाल है दिल का तो कोई समझाए
तुम्हें भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूं
की तुम तो फिर भी हकीक़त हो कोई ख्वाब नही
दर्द अपनाता है पराए कौन
कौन सुनता है और सुनाए कौन

कौन दोहराए वो पुरानी बात
गम अभी सोया है जगाए कौन

वो जो अपने हैं क्या वो अपने हैं कौन
दुःख झेले आज़माए कौन

अब सुकून है तो भूलने में है
लेकिन उस शख्स को भुलाए कौन

आज फिर दिल है कुछ उदास उदास
देखिये आज याद आए कौन

Sath Sath

तुम को देखा तो ये ख़याल आया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया
तुम को...

आज फिर दिलने एक तमन्ना की - (२)
आज फिर दिलको हमने समझाया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया...

तुम चले जाओगे तो सोचेंगे - (२)
हमने क्या खोया, हमने क्या पाया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया...

हम जिसे गुनगुना नहीं सकते - (२)
वक़्त ने ऐसा गीत क्यूँ गाया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया...