ऐ हुस्न-ए-बे-परवाह तुझे शबनम कहूँ शोला कहूँ
फूलों में भी शोख़ी तो है किसको मगर तुझसा कहूँ
गेसू उड़े महकी फ़ज़ा जादू करें आँखें तेरी
सोया हुआ मंज़र कहूँ या जागता सपना कहूँ
चन्दा की तू है चाँदनी लहरों की तू है रागिनी
जान-ए-तमन्ना मैं तुझे क्या क्या कहूँ क्या ना कहूँ
Showing posts with label Ghulam Ali. Show all posts
Showing posts with label Ghulam Ali. Show all posts
Friday, October 3, 2008
हवा चली थी कुछ ऐसी बिखर गये होते
रगों में ख़ून न होता तो मर गये होते
ये सर्द हवा ये आवारगी ये नींद का बोझ
हम अपने शहर में होते तो घर गये होते
हमीं ने रोक लिये अपने सर पे ये इल्ज़ाम
वगरना शहर में किस किस के सर गये होते
हमीं ने ज़ख़्म-ए-दिल-ओ-जाँ छिपा लिया वरना
न जाने कितनों के चेहरे उतर गये होते
सुकून-ए-दिल को न इस तरह तरसते हम
तेरे करम से जो बच कर गुज़र गये होते
रगों में ख़ून न होता तो मर गये होते
ये सर्द हवा ये आवारगी ये नींद का बोझ
हम अपने शहर में होते तो घर गये होते
हमीं ने रोक लिये अपने सर पे ये इल्ज़ाम
वगरना शहर में किस किस के सर गये होते
हमीं ने ज़ख़्म-ए-दिल-ओ-जाँ छिपा लिया वरना
न जाने कितनों के चेहरे उतर गये होते
सुकून-ए-दिल को न इस तरह तरसते हम
तेरे करम से जो बच कर गुज़र गये होते
हक़-ए-वफ़ा जो हम जताने लगे
आप कुछ कह के मुस्कुराने लगे
हमको जीना पड़ेगा फ़ुर्क़त में
वो अगर हिम्मत आज़माने लगे
डर है मेरी ज़ुबाँ न खुल जाये
अब वो बातें बहुत बताने लगे
जान बचती नज़र नहीं आती
ग़ैर उल्फ़त बहुत जताने लगे
तुमको करना पड़ेगा उज्र वफ़ा
हम अगर दर्द-ए-दिल सुनाने लगे
बहुत मुश्किल है शेवा-ए-तस्लीम
हम भी आख़िर को जी चुराने लगे
वक़्त-ए-रुख़्सत था सख़्त ''हाली'' पर
हम भी बैठे थे जब वो जाने लगे
आप कुछ कह के मुस्कुराने लगे
हमको जीना पड़ेगा फ़ुर्क़त में
वो अगर हिम्मत आज़माने लगे
डर है मेरी ज़ुबाँ न खुल जाये
अब वो बातें बहुत बताने लगे
जान बचती नज़र नहीं आती
ग़ैर उल्फ़त बहुत जताने लगे
तुमको करना पड़ेगा उज्र वफ़ा
हम अगर दर्द-ए-दिल सुनाने लगे
बहुत मुश्किल है शेवा-ए-तस्लीम
हम भी आख़िर को जी चुराने लगे
वक़्त-ए-रुख़्सत था सख़्त ''हाली'' पर
हम भी बैठे थे जब वो जाने लगे
हम कि ठहरे अजनबी इतनी मदारातों के बाद
फिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बाद
कब नज़र में आयेगी बेदाग़ सब्ज़े की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद
थे बहुत बे-दर्द ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के
थीं बहुत बेसब्र सुबहें मेहरबाँ रातों के बाद
दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बाद
उनसे जो कहने गये थे 'फ़ैज़' जाँ-सदक़े किये
अनकही ही रह गई वो बात सब बातों के बाद
फिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बाद
कब नज़र में आयेगी बेदाग़ सब्ज़े की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद
थे बहुत बे-दर्द ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के
थीं बहुत बेसब्र सुबहें मेहरबाँ रातों के बाद
दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बाद
उनसे जो कहने गये थे 'फ़ैज़' जाँ-सदक़े किये
अनकही ही रह गई वो बात सब बातों के बाद
दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया
पूछने आते हो हर रोज़ असीरों के मिज़ाज
क्यूँ नहीं कहते हो जाओ तुम्हें आज़ाद किया
है दुआ याद मगर हर्फ़-ए-दुआ याद नहीं
मेरे नग्मात को अंदाज़-ए-नवा याद नहीं
ज़िंदगी ज़ब्र-ए-मुसलसल की तरह काटी है
जाने किस जुर्म की काटी है सज़ा याद नहीं
सिर्फ़ धुँधलाये सितारों की चमक देखी है
कब हुआ कौन हुआ मुझसे ख़फ़ा याद नहीं
आओ एक सजदा करें आलम-ए-मदहोशी में
लोग कहते हैं 'सागर' को ख़ुदा याद नहीं
जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया
पूछने आते हो हर रोज़ असीरों के मिज़ाज
क्यूँ नहीं कहते हो जाओ तुम्हें आज़ाद किया
है दुआ याद मगर हर्फ़-ए-दुआ याद नहीं
मेरे नग्मात को अंदाज़-ए-नवा याद नहीं
ज़िंदगी ज़ब्र-ए-मुसलसल की तरह काटी है
जाने किस जुर्म की काटी है सज़ा याद नहीं
सिर्फ़ धुँधलाये सितारों की चमक देखी है
कब हुआ कौन हुआ मुझसे ख़फ़ा याद नहीं
आओ एक सजदा करें आलम-ए-मदहोशी में
लोग कहते हैं 'सागर' को ख़ुदा याद नहीं
ग़म नहीं जो तन से निकल दिल गया
मिल गये तुम मुझको सब कुछ मिल गया
दाग़-ए-ग़म रोज़-ए-अज़ल ही मिल गया
तन में जाँ आने से पहले दिल गया
ऐ निगाह-ए-यास तेरा हो बुरा
घर तलक रोता हुआ क़ातिल गया
मरहले तय कुंज-ए-उज़्लत में किये
बैठे बैठे सैकड़ों मंज़िल गया
आई जब सहरा में ख़ुश-चश्मों की याद
सामने नरगिस का तख़्ता खिल गया
वा-ए-क़िस्मत ग़ाफ़िल आया मैं 'अमीर'
उम्र भर ग़ाफ़िल रहा ग़ाफ़िल गया
मिल गये तुम मुझको सब कुछ मिल गया
दाग़-ए-ग़म रोज़-ए-अज़ल ही मिल गया
तन में जाँ आने से पहले दिल गया
ऐ निगाह-ए-यास तेरा हो बुरा
घर तलक रोता हुआ क़ातिल गया
मरहले तय कुंज-ए-उज़्लत में किये
बैठे बैठे सैकड़ों मंज़िल गया
आई जब सहरा में ख़ुश-चश्मों की याद
सामने नरगिस का तख़्ता खिल गया
वा-ए-क़िस्मत ग़ाफ़िल आया मैं 'अमीर'
उम्र भर ग़ाफ़िल रहा ग़ाफ़िल गया
दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया
ये मैं सौ जाँ से तिरे तर्ज़-ए-तक़ल्लुम के निसार
फिर तो फ़र्माइये क्या आपने इरशाद किया
इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद
इसका ग़म है कि बहुत देर से बरबाद किया
इतना मानूस हूँ फ़ितरत से कली जब चटकी
झुक के मैंने ये कहा मुझसे कुछ इर्शाद किया
मेरी हर साँस है इस बात की शाहिद ऐ मौत
मैंने हर लुत्फ़ के मौक़े पे तुझे याद किया
मुझको तो होश नहीं तुमको ख़बर हो शायद
लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बरबाद किया
कुछ नहीं इसके सिवा 'जोश' हरीफ़ों का कलाम
वस्ल ने शाद किया हिज्र ने ना-शाद किया
जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया
ये मैं सौ जाँ से तिरे तर्ज़-ए-तक़ल्लुम के निसार
फिर तो फ़र्माइये क्या आपने इरशाद किया
इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद
इसका ग़म है कि बहुत देर से बरबाद किया
इतना मानूस हूँ फ़ितरत से कली जब चटकी
झुक के मैंने ये कहा मुझसे कुछ इर्शाद किया
मेरी हर साँस है इस बात की शाहिद ऐ मौत
मैंने हर लुत्फ़ के मौक़े पे तुझे याद किया
मुझको तो होश नहीं तुमको ख़बर हो शायद
लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बरबाद किया
कुछ नहीं इसके सिवा 'जोश' हरीफ़ों का कलाम
वस्ल ने शाद किया हिज्र ने ना-शाद किया
Sunday, September 28, 2008
Subscribe to:
Comments (Atom)
