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Tuesday, November 4, 2008

कुछ छोटे सपनो के बदले ,

बड़ी नींद का सौदा करने ,

निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे !

वही प्यास के अनगढ़ मोती ,

वही धूप की सुर्ख कहानी ,

वही आंख में घुटकर मरती ,

आंसू की खुद्दार जवानी ,

हर मोहरे की मूक विवशता ,चौसर के खाने क्या जाने

हार जीत तय करती है वे , आज कौन से घर ठहरेंगे .

निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे !


कुछ पलकों में बंद चांदनी ,

कुछ होठों में कैद तराने ,

मंजिल के गुमनाम भरोसे ,

सपनो के लाचार बहाने ,

जिनकी जिद के आगे सूरज, मोरपंख से छाया मांगे ,

उन के भी दुर्दम्य इरादे , वीणा के स्वर पर ठहरेंगे .

निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे

अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसू के संग होते हैं,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं,सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार-बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं,
जब ऊँच-नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।


जब पोथे खाली होते है, जब हर सवाली होते हैं,
जब गज़लें रास नही आती, अफ़साने गाली होते हैं,
जब बासी फीकी धूप समेटे दिन जल्दी ढल जता है,
जब सूरज का लश्कर चाहत से गलियों में देर से जाता है,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है,
जब कालेज से घर लाने वाली पहली बस छुट जाती है,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है,
जब लाख मन करने पर भी पारो पढ़ने आ जाती है,
जब अपना हर मनचाहा काम कोई लाचारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।


जब कमरे में सन्नाटे की आवाज़ सुनाई देती है,
जब दर्पण में आंखों के नीचे झाई दिखाई देती है,
जब बड़की भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,
क्या लिखते हो दिन भर, कुछ सपनों का भी सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हमें बुलाते है,हम जाते हैं,घबराते हैं,
जब साड़ी पहने एक लड़की का फोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमें मनाती हैं, फोटो दिखलाया जाता है,
जब सारे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।


दीदी कहती हैं उस पगली लडकी की कुछ औकात नहीं,
उसके दिल में भैया तेरे जैसे प्यारे जज़्बात नहीं,
वो पगली लड़की एक दिन मेरे लिए भूखी रहती है,
चुप चुप सारे व्रत करती है, मगर मुझसे कुछ ना कहती है,
जो पगली लडकी कहती है, हाँ प्यार तुझी से करती हूँ,
लेकिन मैं हूँ मजबूर बहुत, अम्मा-बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लड़की पर अपना कुछ अधिकार नहीं बाबा,
ये कथा-कहानी-किस्से हैं, कुछ भी सार नहीं बाबा,
बस उस पगली लडकी के संग जीना फुलवारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है |||

Wednesday, October 15, 2008

मैं जब भी तेज चलता हूँ, नज़ारे छूट जाते हैं,
कोई जब रूप धरता हूँ, तो साँसे टूट जाते है,
मैं रोता हूँ तो आकर लोग कन्धा थपथपाते हैं,
मैं हँसता हूँ तो अक्सर लोग मुझसे रूठ जाते हैं.

बहुत बिखरा बहुत टूटा,थपेडे सह नही पाया,
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह नही पाया,
अधुरा अनसुना ही रह गया ये प्यार का किस्सा,
कभी तू सुन नही पायी कभी मैं कह नही पाया.
तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ

तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ

तुम्हे मै भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नही लेकिन

तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ
"कोई दीवाना कहता है
कोई पागल समझता है 
मगर धरती की बेचैनी को 
बस बदल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ 
तू मुझसे दूर कैसी है 
ये तेरा दिल समझता है 
या मेरा दिल समझता है"

"मोहब्बत एक एहसासों की 
पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था 
कभी मीरा दीवानी थी 
यहाँ सब लोग कहते है 
मेरी आँखों में आंसू है 
जो तू समझे तो मोती है 
जो ना समझे तो पानी है"

"समंदर पीर के अंदर है 
लेकिन रो नहीं सकता 
ये आंसू प्यार का मोती है 
इसको खो नहीं सकता 
मेरी चाहत को दुल्हन तू
बना लेना मगर सुनले 
जो मेरा हो नहीं पाया 
वो तेरा हो नहीं सकता "

भर्मर कोई कुमुदनी पर 
मचल बैठा तो हंगामा 
हमारे दिल में कोई ख्वाब 
पल बैठा तो हंगामा 
अभी तक डूब कर सुनते थे 
सब किस्सा मोहब्बत का 
हम किस्से को हकीक़त में
बदल बैठे तो हंगामा"