क्या उम्मीद करे हम उन से जिन को वफ़ा मालूम नहीं
गम देना मालूम है लेकिन गम की दवा मालूम नहीं
जिन की गली में उम्र गँवा दी जीवन भर हैरान रहे
पास भी आके पास न आए जान के भी अनजान रहे
कौन सी आख़िर की थी हमने ऎसी खता मालूम नहीं
ऐ मेरे पागल अरमानों झूठे बन्धन तोड़ भी दो
ऐ मेरी ज़ख्मी उम्मीदों दिल का दामन छोड़ भी दो
तुम को अभी इस नगरी में जीने की सज़ा मालूम नहीं
Showing posts with label Zafar Gorakhpuri. Show all posts
Showing posts with label Zafar Gorakhpuri. Show all posts
Monday, October 13, 2008
Saturday, October 4, 2008
मजबूरी के मौसम में भी जीना पड़ता है
थोडा सा समझौता जानम करना पड़ता है
कभी कभी कुछ इस हद तक बढ़ जाती है लाचारी
लगता है ये जीवन जैसे बोझ हो कोई भारी
दिल कहता है रोएँ लेकिन हंसना पड़ता है
कभी कभी इतनी धुंधली हो जाती हैं तस्वीरें
पता नहीं चलता कदमों में कितनी हैं जंजीरें
पाँव बंधे होते हैं लेकिन चलना पड़ता है
रूठ के जाने वाले बादल तू आने वाला तारा
किस को ख़बर किन लम्हों में बन जाए कौन सहारा
दुनिया जैसी भी हो रिश्ता रखना पड़ता है
थोडा सा समझौता जानम करना पड़ता है
कभी कभी कुछ इस हद तक बढ़ जाती है लाचारी
लगता है ये जीवन जैसे बोझ हो कोई भारी
दिल कहता है रोएँ लेकिन हंसना पड़ता है
कभी कभी इतनी धुंधली हो जाती हैं तस्वीरें
पता नहीं चलता कदमों में कितनी हैं जंजीरें
पाँव बंधे होते हैं लेकिन चलना पड़ता है
रूठ के जाने वाले बादल तू आने वाला तारा
किस को ख़बर किन लम्हों में बन जाए कौन सहारा
दुनिया जैसी भी हो रिश्ता रखना पड़ता है
Subscribe to:
Comments (Atom)
