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Monday, October 13, 2008

क्या उम्मीद करे हम उन से जिन को वफ़ा मालूम नहीं 
गम देना मालूम है लेकिन गम की दवा मालूम नहीं 

जिन की गली में उम्र गँवा दी जीवन भर हैरान रहे 
पास भी आके पास न आए जान के भी अनजान रहे 
कौन सी आख़िर की थी हमने ऎसी खता मालूम नहीं 

ऐ मेरे पागल अरमानों झूठे बन्धन तोड़ भी दो 
ऐ मेरी ज़ख्मी उम्मीदों दिल का दामन छोड़ भी दो 
तुम को अभी इस नगरी में जीने की सज़ा मालूम नहीं 

Saturday, October 4, 2008

मौसम को इशारों से बुला क्यूँ नहीं लेते 
रूठा है अगर वो तो मना क्यूँ नहीं लेते 

दीवाना तुम्हारा कोई गैर नहीं है
मचला भी तो सीने से लगा क्यूँ नहीं लेते 

ख़त लिख कर कभी और कभी ख़त को जलाकर 
तन्हाई को रंगीन बना क्यूँ नहीं लेते 

तुम जाग रहे हो मुझ को अच्छा नहीं लगता 
चुपके से मेरी नींद चुरा क्यूँ नहीं लेते
मजबूरी के मौसम में भी जीना पड़ता है  
थोडा सा समझौता जानम करना पड़ता है 

कभी कभी कुछ इस हद तक बढ़ जाती है लाचारी 
लगता है ये जीवन जैसे बोझ हो कोई भारी 
दिल कहता है रोएँ लेकिन हंसना पड़ता है 

कभी कभी इतनी धुंधली हो जाती हैं तस्वीरें 
पता नहीं चलता कदमों में कितनी हैं जंजीरें 
पाँव बंधे होते हैं लेकिन चलना पड़ता है 

रूठ के जाने वाले बादल तू आने वाला तारा 
किस को ख़बर किन लम्हों में बन जाए कौन सहारा  
दुनिया जैसी भी हो रिश्ता रखना पड़ता है