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Sunday, September 28, 2008

अब क्या बताऊँ मैं तेरे मिलने से क्या मिला
इर्फ़ान-ए-ग़म हुआ मुझे दिल का पता मिला

जब दूर तक न कोई फ़कीर आशना मिला
तेरा नियाज़मंद तेरे दर से जा मिला

मन्ज़िल मिली, मुराद मिली, मुद्दा मिला
सब कुछ मुझे मिला जो तेरा नक़्श-ए-पा मिला

या ज़ख़्म-ए-दिल को चीर के सीने से फेंक दे
या ऐतराफ़ कर कि निशान-ए-वफ़ा मिला

सीमाब को शगुफ़्ता न देखा तमाम उम्र
कम्बख़्त जब मिला हमें ग़म आशना मिला

Thursday, September 25, 2008

शमा का जलना है या सोज़िश-ए-परवाना है
चंद लफ़्ज़ों में यही इश्क़ का अफ़साना है

ये जुनूँ है कि यहाँ तक मेरा बढ़ जाये जुनूँ
हँसके सीमाब न ये कह दे कि ये दीवाना है

दिल शिकस्ता लिये बैठा है उमंगों का हुजूम
एक टूटे हुए पैमाने में मैख़ाना है

हाँ बला दिल का तसल्ली के लिये है हसरत
यही साग़र यही शीशा, यही पैमाना है