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Saturday, July 25, 2009

जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया

उम्र भर दोहराऊँगा ऐसी कहानी दे गया

उस से मैं कुछ पा सकूँ ऐसी कहाँ उम्मीद थी
ग़म भी वो शायद बरा-ए-मेहरबानी दे गया

सब हवायें ले गया मेरे समंदर की कोई
और मुझ को एक करती बादबानी दे गया

ख़ैर मैं प्यासा रहा पर उस ने इतना तो किया
मेरी पलकों की कतारों को वो पानी दे गया

Tuesday, November 4, 2008

हम तो यूँ अपनी ज़िन्दगी से मिले 
अजनबी जैसे अजनबी से मिले 

हर वफ़ा एक जुर्म हो गोया 
दोस्त कुछ ऐसी बेरुख़ी से मिले 

फूल ही फूल हम ने माँगे थे 
दाग़ ही दाग़ ज़िन्दगी से मिले 

जिस तरह आप हम से मिलते हैं 
आदमी यूँ न आदमी से मिले 

दिल की दीवार-ओ-दर पे क्या देखा 
बस तेरा नाम ही लिखा देखा 

तेरी आँखों में हमने क्या देखा 
कभी क़ातिल कभी ख़ुदा देखा 

अपनी सूरत लगी प्यारी सी 
जब कभी हमने आईना देखा 

हाय अंदाज़ तेरे रुकने का 
वक़्त को भी रुका रुका देखा 

तेरे जाने में और आने में 
हमने सदियों का फ़ासला देखा 

फिर न आया ख़याल जन्नत का 
जब तेरे घर का रास्ता देखा

ढल गया आफ़ताब ऐ साक़ी 
ला पिला दे शराब ऐ साक़ी 

या सुराही लगा मेरे मुँह से 
या उलट दे नक़ाब ऐ साक़ी 

मैकदा छोड़ कर कहाँ जाऊँ 
है ज़माना ख़राब ऐ साक़ी 

जाम भर दे गुनाहगारों के 
ये भी है इक सवाब ऐ साक़ी 

आज पीने दे और पीने दे 
कल करेंगे हिसाब ऐ साक़ी 

अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें
हम उनके लिए ज़िंदगानी लुटा दें 

हर एक मोड़ पर हम ग़मों को सज़ा दें 
चलो ज़िन्दगी को मोहब्बत बना दें 

अगर ख़ुद को भूले तो, कुछ भी न भूले 
कि चाहत में उनकी, ख़ुदा को भुला दें 

कभी ग़म की आँधी, जिन्हें छू न पाये 
वफ़ाओं के हम, वो नशेमन बना दें 

क़यामत के दीवाने कहते हैं हमसे 
चलो उनके चहरे से पर्दा हटा दें 

सज़ा दें, सिला दें, बना दें, मिटा दें 
मगर वो कोई फ़ैसला तो सुना दें 

आदमी आदमी को क्या देगा 
जो भी देगा वही ख़ुदा देगा 

मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिब है 
क्या मेरे हक़ में फ़ैसला देगा 

ज़िन्दगी को क़रीब से देखो 
इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा 

हमसे पूछो दोस्ती का सिला 
दुश्मनों का भी दिल हिला देगा 

इश्क़ का ज़हर पी लिया "फ़ाकिर" 
अब मसीहा भी क्या दवा देगा 

Friday, October 3, 2008

होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है

उनसे नज़रें क्या मिलीं रोशन फ़िज़ाएं हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है

खुलती ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शायरी
झुकती आँखों ने बताया मैकशी क्या चीज़ है

हम लबों से कह न पाए उनसे हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है
ये ज़िंदग़ी !
आज जो, तुम्हारे बदन की छोटी-बड़ी नसों में
मचल रही है, तुम्हारे पैरों से, चल रही है

ये ज़िंदग़ी !
तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से, निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में, ढल रही है

ये ज़िंदग़ी !
जाने कितनी सदियों से यूँही शक़लें
बदल रही है

बदलती शक़लें
बदलते जिस्मों में
चलता-फिरता ये इक शरारा
जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा
इसी से सारी शहल-पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा

सितारे तोड़ो, या घर बसाओ
क़लम उठाओ, या सर झुकाओ

तुम्हारी आँखों की रोश्नी तक
है खेल सारा

ये खेल होगा नहीं दुबारा!
ये खेल होगा नहीं दुबारा!
ओ मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की, बिन चिठ्ठी बिन तार
छोटा करके देखिये, जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है, बाहों भर संसार

ए लेके तन के नाप को, घूमे बस्ती गाँव
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव
सबकी पूजा एक सी, अलग-वलग हर रीत
मस्जिद जाए मौल्वी, कोयल गाए गीत

पूजा घर में मूर्ती, मीर के संग श्याम
जिसकी जितनी चाकरी, उतने उसके दाम

सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक, भूका रहे फ़कीर
अच्छी संगत बैठकर, संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से, मीठी हो गई धूप

सपना झर्ना नींद का, जागी आँखें प्यास
पाना खोना खोजना, साँसों का इतिहास
चाहे गीता वाचिए, या पढ़िए क़ुरान
मेरा तेरा प्यार ही, हर पुस्तक का ज्ञान
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी

सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी

हर तरफ़ भागते दौड़ते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी

रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
ज: हर नयी दिन नया इंतज़ार आदमी

ज: ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र डर सफ़र
ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र डर सफ़र
आखिरी साँस तक बेक़रार आदमी
जवानी के हीले, हया के बहाने
ये मान के तुम मुझसे पर्दआ करोगी
ये दुनिया मगर तुझसी भोली नहीं है
छुपकर मुहब्बत को रुसवा करोगी

बड़ी कोशिशों से, बड़ी ख़्वाहिशों से
तमन्ना के सहमी हुई साज़िशोण से
मिलेगा जो मौका, तो बेचैन होकर
दरीचों से तुम मुझको देखा करोगी

सतायेगी जब चाँदनी की उदासी
दुखायेगी दिल फ़िज़ा की खमोशी
उफ़क़ की तरफ़ खाली नज़रें जमाकर
कभी जो न सोचा वो सोचा करोगी

कभी दिल की धड़कन महसूस होगी
कभी ठण्डी साँसोण के तूफ़ान उठेंगे
कभी गिर के बिस्तर पे आहें भरोगी
कभी झुक के तकिये पे रोया करोगी
शायद मैं ज़िंदगी की सहर लेके आ गया
कातिल को आज अपने ही घर लेके आ गया

ता-उम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क़ की
अंजाम ये कि गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया

नश्तर है मेरे हाथ में, कंधों पे मयक़दा
लो मैं इलाज-ए-दर्द-ए-जिग़र लेके आ गया

""फ़ाकिर"" सनमकदे में न आता मैं लौटकर
इक Zअख़्म भर गया था इधर लेके आ गया

Sath Sath

तुम को देखा तो ये ख़याल आया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया
तुम को...

आज फिर दिलने एक तमन्ना की - (२)
आज फिर दिलको हमने समझाया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया...

तुम चले जाओगे तो सोचेंगे - (२)
हमने क्या खोया, हमने क्या पाया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया...

हम जिसे गुनगुना नहीं सकते - (२)
वक़्त ने ऐसा गीत क्यूँ गाया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया...
धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो
ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटाकर देखो

वो सितारा चमकने दो यूँही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो

पत्थरों में भी ज़ुबां होती है, दिल होता है
अपने घर के दर-ओ-दीवार सजाकर देखो

फ़ासिला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या ना मिले हाथ बढ़ाकर देखो

Sajda

किस को क़ातिल मैं कहूँ किस को मसीहा समझूँ
सब यहाँ दोस्त ही बैठे हैं किसे क्या समझूँ

वो भी क्या दिन थे के हर वहम यकीन होता था
अब हक़ीकत नज़र आये तो उसे क्या समझूँ

दिल जो टूटा तो कई हाथ दुआ को उठे
ऐसे माहौल में अब किस को पराया समझूँ

ज़ुल्म ये है के है यक़्ता तेरी बेगानारवी
लुत्फ़ ये है के मैं अब तक तुझे अपना समझूँ

Sunday, September 28, 2008

ग़म बड़े आते हैं कातिल की निगाहों की तरह
तुम छिपा लो मुझे, ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह

अपनी नज़रों में गुनहगार न होते, क्यों कर
दिल ही दुश्मन हैं मुखालिफ़ के ग्वाहों की तरह

हर तरफ़ ज़ीस्त की राहों में कड़ी धूप है दोस्त
बस तेरी याद का साया है पनाहों की तरह

जिनके ख़ातिर कभी इल्ज़ाम उठाए, 'फ़ाकिर'
वो भी पेश आए हैं इनसाफ़ के शाहों की तरह
दोस्त बन बन के मिले मुझको मिटाने वाले
मैने देखे हैं कई रंग बदलने वाले

तुमने चुप रहके सितम और भी ढाया मुझपर
तुमसे अच्छे हैं मेरे हाल पे हँसने वाले

मैं तो इखलाक़ के हाथों ही बिका करता हूँ
और होंगे तेरे बाज़ार में बिकने वाले

अखिरी दौर पे सलाम-ए-दिल-ए-मुस्तर लेलो (?)
फिर ना लौटेंगे शब-ए-हिज्र पे रोनेवाले...
आए हैं समझाने लोग
हैं कितने दीवाने लोग

दैर-ओ-हरम में चैन जो मिलता
क्यूं जाते मैखाने लोग

जान के सब कुछ कुछ भी ना जाने
हैं कितने अन्जाने लोग

वक़्त पे काम नहीं आते हैं
ये जाने पहचाने लोग

अब जब मुझको होश नहीं है
आए हैं समझाने लोग
हैं कितने ...

Thursday, September 25, 2008

अपना ग़म भूल गये, तेरी जफ़ा भूल गये
हम तो हर बात मुहब्बत के सिवा भूल गये

हम अकेले ही नहीं प्यार के दीवाने, सनम
आप भी नज़्रें झुकाने की 'अदा भूल गये

अब तो सोचा है कि दामन ही तेर थामेंगे
हाथ जब हम ने उठाये हैं दुआ भूल गये

शुक्र सम्झो या इसे अपनी शिकायत सम्झो
तुम ने वो दर्द दिया है कि दवा भूल गये
कल चौदहवीं की रात थी
शब भर रहा चर्चा तेरा
कुछ ने कहा ये चाँद है
कुछ ने कहा चेहरा तेरा

१) हम भी वहीं मौजूद थे
हम से भी सब पूछा कि ये
हम हंस दिये हम चुप रहे
मंज़ूर था परदा तेरा, कल ...

२) इस शहर में किस से मिलें
हम से तो छूटी महफ़िलें
हर शख्स तेरा नाम ले
हर शख्स दीवाना तेरा, कल ...

३) कूचे को तेरे छोड़कर
जोगी ही बन जाएं मगर
जंगल तेरे पर्वत तेरे
बस्ती तेरी सेहरा तेरा, कल ...

४) बेदर्द तुम ही हो तो चल
कहता है क्या अच्छी गज़ल
आशिक़ तेरा रुसवा तेरा
शायर तेरा इन्शा तेरा, कल ...