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Friday, August 28, 2009

सौ ख़ुलूस बातों में सब करम ख़यालों में
बस ज़रा वफ़ा कम है तेरे शहर वालों में

पहली बार नज़रों ने चाँद बोलते देखा
हम जवाब क्या देते खो गये सवालों में

रात तेरी यादों ने दिल को इस तरह छेड़ा
जैसे कोई चुटकी ले नर्म नर्म गालों में

मेरी आँख के तारे अब न देख पाओगे
रात के मुसाफ़िर थे खो गये उजालों में


Tuesday, November 4, 2008

उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं 
ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं 

घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँखें मलते हैं 
तमाम रात खजूरों के पेड़ जलते हैं 

मैं शाह राह नहीं, रास्ते का पत्थर हूँ 
यहाँ सवार भी पैदल उतर कर चलते हैं 

उन्हें कभी न बताना मैं उनकी आँखें हूँ 
वो लोग फूल समझकर मुझे मसलते हैं 

ये एक पेड़ है, आ इस से मिलकर रो लें हम 
यहाँ से तेरे मेरे रास्ते बदलते हैं 

कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से 
कहीं भी जाऊँ मेरे साथ साथ चलते हैं

कोई काँटा चुभा नहीं होता,
दिल अगर फूल सा नहीं होता,

मैं भी शायद बुरा नहीं होता 
वो अगर बेवफ़ा नहीं होता 

बेवफ़ा बेवफ़ा नहीं होता 
ख़त्म ये फ़ासला नहीं होता 

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी 
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता 

जी बहुत चाहता है सच बोलें 
क्या करें हौसला नहीं होता 

रात का इंतज़ार कौन करे 
आज-कल दिन में क्या नहीं होता 

गुफ़्तगू उन से रोज़ होती है 
मुद्दतों सामना नहीं होता 

कोई काँटा चुभा नहीं होता 
दिल अगर फूल सा नहीं होता 

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता 

गुफ़्तगू उन से रोज़ होती है
मुद्दतों सामना नहीं होता 

जी बहुत चाहता सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता 

रात का इंतज़ार कौन करे
आज कल दिन में क्या नहीं होता

होठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते 
साहिल पे समुंदर के ख़ज़ाने नहीं आते

पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी 
आँखों को अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते 

दिल उजड़ी हुई इक सराये की तरह है 
अब लोग यहाँ रात जगाने नहीं आते 

उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में 
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते 

इस शहर के बादल तेरी ज़ुल्फ़ों की तरह हैं 
ये आग लगाते हैं बुझाने नहीं आते 

अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गये हैं 
आते हैं मगर दिल को दुखाने नहीं आते 

भूल शायद बहुत बड़ी कर ली 
दिल ने दुनिया से दोस्ती कर ली 

तुम मुहब्बत को खेल कहते हो 
हम ने बर्बाद ज़िन्दगी कर ली 

उस ने देखा बड़ी इनायत से 
आँखों आँखों में बात भी कर ली 

आशिक़ी में बहुत ज़रूरी है 
बेवफ़ाई कभी कभी कर ली 

हम नहीं जानते चिराग़ों ने 
क्यों अंधेरों से दोस्ती कर ली 

धड़कनें दफ़्न हो गई होंगी 
दिल में दीवार क्यों खड़ी कर ली 

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
किश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा

बेवक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा

जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं
तुमने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा

पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा

मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला 
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला 

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे 
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला 

तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था 
फिर इसके बाद मुझे कोई अजनबी न मिला 

बहुत अजीब है ये क़ुर्बतों की दूरी भी 
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला 

ख़ुदा की इतनी बड़ी क़ायनात में मैंने 
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वो ही न मिला

जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे 
हज़ारों तरफ़ से निशाने लगे

हुई शाम यादों के इक गाँव में 
परिंदे उदासी के आने लगे 

घड़ी दो घड़ी मुझको पलकों पे रख 
यहाँ आते आते ज़माने लगे 

कभी बस्तियाँ दिल की यूँ भी बसीं 
दुकानें खुलीं, कारख़ाने लगे 

वहीं ज़र्द पत्तों का कालीन है 
गुलों के जहाँ शामियाने लगे 

पढाई लिखाई का मौसम कहाँ 
किताबों में ख़त आने-जाने लगे 

आँखों में रहा दिल में न उतरकर देखा,
कश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा

बेवक़्त अगर जाऊँगा, सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा

जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं,
तुमने मेरा काँटों-भरा बिस्तर नहीं देखा

पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा 

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में 
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में 

और जाम टूटेंगे इस शराब-ख़ाने में 
मौसमों के आने में मौसमों के जाने में 

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं 
उम्र बीत जाती है दिल को दिल बनाने में 

फ़ाख़्ता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकती 
कौन साँप रहता है उसके आशियाने में 

दूसरी कोई लड़की ज़िन्दगी में आयेगी 
कितनी देर लगती है उसको भूल जाने में 

मुझसे बिछड़ के ख़ुश रहते हो 
मेरी तरह तुम भी झूठे हो 

इक टहनी पर चाँद टिका था 
मैं ये समझा तुम बैठे हो 

उजले उजले फूल खिले थे 
बिल्कुल जैसे तुम हँसते हो 

मुझ को शाम बता देती है 
तुम कैसे कपड़े पहने हो 

तुम तन्हा दुनिया से लड़ोगे 
बच्चों सी बातें करते हो

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा ।

इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा ।


हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,

जिस तरफ़ भी चल पड़ेगे, रास्ता हो जाएगा ।


कितना सच्चाई से, मुझसे ज़िंदगी ने कह दिया,

तू नहीं मेरा तो कोई, दूसरा हो जाएगा ।


मैं खूदा का नाम लेकर, पी रहा हूँ दोस्तो,

ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा ।


सब उसी के हैं, हवा, ख़ुश्बु, ज़मीनो-आस्माँ,

मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा ।

न जी भर के देखा न कुछ बात की 
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की 

कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं 
कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की 

उजालों की परियाँ नहाने लगीं 
नदी गुनगुनाई ख़यालात की 

मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई 
ज़ुबाँ सब समझते हैं जज़्बात की 

सितारों को शायद ख़बर ही नहीं 
मुसाफ़िर ने जाने कहाँ रात की 

मुक़द्दर मेरे चश्म-ए-पुर'अब का 
बरसती हुई रात बरसात की 

एक चेहरा साथ साथ रहा जो मिला नहीं 
किसको तलाश करते रहे कुछ पता नहीं 

शिद्दत की धूप तेज़ हवाओं के बावजूद 
मैं शाख़ से गिरा हूँ नज़र से गिरा नहीं 

आख़िर ग़ज़ल का ताजमहल भी है मकबरा 
हम ज़िन्दगी थे हमको किसी ने जिया नहीं 

जिसकी मुखालफ़त हुई मशहूर हो गया 
इन पत्थरों से कोई परिंदा गिरा नहीं 

तारीकियों में और चमकती है दिल की धूप 
सूरज तमाम रात यहां डूबता नहीं 

किसने जलाई बस्तियाँ बाज़ार क्यों लुटे 
मैं चाँद पर गया था मुझे कुछ पता नहीं

Saturday, October 4, 2008

अब किसे चाहें किसे दुंदा करें
वो भी आखिर मिल गया अब क्या करें

हलकी हलकी बारिशें  होती  रहें 
हम भी फूलों की तरह भीगा करें
आँख मूंदे उस गुलाबी धूप में 
देर तक बैठे उसे सोचा करें 

दिल मुहब्बत दीन दुनिया शायरी
हर दरीचे से तुझे देखा करें

घर नया कपडे नए बर्तन नए
इन पुराने कागजों का क्या करें  
आस होगी न आसरा होगा
आने वाले दिनों में क्या होगा

मैं तुझे भूल जाऊँगा इक दिन
वक़्त सब कुछ बदल चुका होगा

नाम हम ने लिखा था आंखों में
आंसूओं ने मिटा दिया होगा

आसमान भर गया परिंदों से
पेड़ कोई हरा गिरा होगा

कितना दुश्वार था सफर उस का
वो सर-ऐ-शाम सो गया होगा
आंसूओं की जहाँ पायमाली रही
ऎसी बस्ती चरागों से खाली रही

दुश्मनों की तरह उस से लड़ते रहे
अपनी चाहत भी कितनी निराली रही

जब कभी भी तुम्हारा ख़याल आ गया
फिर कई रोज़ तक बेखयाली रही

लब तरसते रहे इक हँसी के लिए
मेरी कश्ती मुसाफिर से खाली रही

चाँद तारे साभी हमसफ़र थे मगर
जिंदगी रात थी रात काली रही

मेरे सीने पे खुश्बू ने सर रख दिया
मेरी बांहों में फूलों की डाली रही
आ चांदनी भी मेरी तरह जाग रही है
पलकों पे सितारों को लिए रात खडी है

ये बात की सूरत के भले दिल के बुरे हों
अल्लाह करे झूठ हो बहुतों से सूनी है

वो माथे का मतला हो की होंठों के दो मिसरे
बचपन की ग़ज़ल ही मेरी महबूब रही है

ग़ज़लों ने वहीं जुल्फों के फैला दिए साए
जिन राहों पे देखा है बहुत धूप कडी है

हम दिल्ली भी हो आए हैं लाहौर भी घुमे
ऐ यार मगर तेरी गली तेरी गली है

Friday, October 3, 2008

ऐ हुस्न-ए-बे-परवाह तुझे शबनम कहूँ शोला कहूँ
फूलों में भी शोख़ी तो है किसको मगर तुझसा कहूँ

गेसू उड़े महकी फ़ज़ा जादू करें आँखें तेरी
सोया हुआ मंज़र कहूँ या जागता सपना कहूँ

चन्दा की तू है चाँदनी लहरों की तू है रागिनी
जान-ए-तमन्ना मैं तुझे क्या क्या कहूँ क्या ना कहूँ