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Tuesday, November 4, 2008

जब भी तन्हाई से घबरा के सिमट जाते हैं 
हम तेरी याद के दामन से लिपट जाते हैं

उन पे तूफ़ाँ को भी अफ़सोस हुआ करता है 
वो सफ़ीने जो किनारों पे उलट जाते हैं 

हम तो आये थे रहें शाख़ में फूलों की तरह 
तुम अगर हार समझते हो तो हट जाते हैं 

इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया
वर्ना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया

आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया

रोनेवालों से कह दो उनका भी रोना रोलें
जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया

तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था
तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया

एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें "फ़ाकिर"
हम को हर रोज़ के सदमात ने रोने न दिया

हम तो यूँ अपनी ज़िन्दगी से मिले 
अजनबी जैसे अजनबी से मिले 

हर वफ़ा एक जुर्म हो गोया 
दोस्त कुछ ऐसी बेरुख़ी से मिले 

फूल ही फूल हम ने माँगे थे 
दाग़ ही दाग़ ज़िन्दगी से मिले 

जिस तरह आप हम से मिलते हैं 
आदमी यूँ न आदमी से मिले 

दिल की दीवार-ओ-दर पे क्या देखा 
बस तेरा नाम ही लिखा देखा 

तेरी आँखों में हमने क्या देखा 
कभी क़ातिल कभी ख़ुदा देखा 

अपनी सूरत लगी प्यारी सी 
जब कभी हमने आईना देखा 

हाय अंदाज़ तेरे रुकने का 
वक़्त को भी रुका रुका देखा 

तेरे जाने में और आने में 
हमने सदियों का फ़ासला देखा 

फिर न आया ख़याल जन्नत का 
जब तेरे घर का रास्ता देखा

ढल गया आफ़ताब ऐ साक़ी 
ला पिला दे शराब ऐ साक़ी 

या सुराही लगा मेरे मुँह से 
या उलट दे नक़ाब ऐ साक़ी 

मैकदा छोड़ कर कहाँ जाऊँ 
है ज़माना ख़राब ऐ साक़ी 

जाम भर दे गुनाहगारों के 
ये भी है इक सवाब ऐ साक़ी 

आज पीने दे और पीने दे 
कल करेंगे हिसाब ऐ साक़ी 

अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें
हम उनके लिए ज़िंदगानी लुटा दें 

हर एक मोड़ पर हम ग़मों को सज़ा दें 
चलो ज़िन्दगी को मोहब्बत बना दें 

अगर ख़ुद को भूले तो, कुछ भी न भूले 
कि चाहत में उनकी, ख़ुदा को भुला दें 

कभी ग़म की आँधी, जिन्हें छू न पाये 
वफ़ाओं के हम, वो नशेमन बना दें 

क़यामत के दीवाने कहते हैं हमसे 
चलो उनके चहरे से पर्दा हटा दें 

सज़ा दें, सिला दें, बना दें, मिटा दें 
मगर वो कोई फ़ैसला तो सुना दें 

आज तुम से बिछड़ रहा हूँ 
आज कहता हूँ फिर मिलूँगा तुम से 
तुम मेरा इंतज़ार करती रहो 
आज का ऐतबार करती रहो 

लोग कहते हैं वक़्त चलता है 
और इंसान भी बदलता है 
काश रुक जाये वक़्त आज की रात 
और बदले न कोई आज के बाद 

वक़्त बदले ये दिल न बदलेगा 
तुम से रिश्ता कभी न टूटेगा 
तुम ही ख़ुश्बू हो मेरी साँसों की 
तुम ही मंज़िल हो मेरे सपनों की 

लोग बोते हैं प्यार के सपने 
और सपने बिखर भी जाते हैं 
एक एहसास ही तो है ये वफ़ा 
और एहसास मर भी जाते हैं 

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है 
ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है 

जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है 
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है 

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी 
अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूँ है 

ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब "फ़ाकिर" 
वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है 

आदमी आदमी को क्या देगा 
जो भी देगा वही ख़ुदा देगा 

मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिब है 
क्या मेरे हक़ में फ़ैसला देगा 

ज़िन्दगी को क़रीब से देखो 
इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा 

हमसे पूछो दोस्ती का सिला 
दुश्मनों का भी दिल हिला देगा 

इश्क़ का ज़हर पी लिया "फ़ाकिर" 
अब मसीहा भी क्या दवा देगा 

Friday, October 3, 2008

शायद मैं ज़िंदगी की सहर लेके आ गया
कातिल को आज अपने ही घर लेके आ गया

ता-उम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क़ की
अंजाम ये कि गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया

नश्तर है मेरे हाथ में, कंधों पे मयक़दा
लो मैं इलाज-ए-दर्द-ए-जिग़र लेके आ गया

""फ़ाकिर"" सनमकदे में न आता मैं लौटकर
इक Zअख़्म भर गया था इधर लेके आ गया

Sunday, September 28, 2008

ग़म बड़े आते हैं कातिल की निगाहों की तरह
तुम छिपा लो मुझे, ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह

अपनी नज़रों में गुनहगार न होते, क्यों कर
दिल ही दुश्मन हैं मुखालिफ़ के ग्वाहों की तरह

हर तरफ़ ज़ीस्त की राहों में कड़ी धूप है दोस्त
बस तेरी याद का साया है पनाहों की तरह

जिनके ख़ातिर कभी इल्ज़ाम उठाए, 'फ़ाकिर'
वो भी पेश आए हैं इनसाफ़ के शाहों की तरह