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Friday, August 28, 2009

कुछ तबीयत ही मिली थी ऐसी चैन से जीने की सूरत ना हुई
जिसको चाहा उसे अपना ना सके जो मिला उससे मुहब्बत ना हुई

जिससे जब तक मिले दिल ही से मिले दिल जो बदला तो फसाना बदला
रस्में दुनिया की निभाने के लिए हमसे रिश्तों की तिज़ारत[१] ना हुई

दूर से था वो कई चेहरों में पास से कोई भी वैसा ना लगा
बेवफ़ाई भी उसी का था चलन फिर किसीसे भी शिकायत ना हुई

वक्त रूठा रहा बच्चे की तरह राह में कोई खिलौना ना मिला
दोस्ती भी तो निभाई ना गई दुश्मनी में भी अदावत ना हुई

Tuesday, May 12, 2009

दिल में ना हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलती
ख़ैरात में इतनी बङी दौलत नहीं मिलती

कुछ लोग यूँही शहर में हमसे भी ख़फा हैं
हर एक से अपनी भी तबीयत नहीं मिलती

देखा था जिसे मैंने कोई और था शायद
वो कौन है जिससे तेरी सूरत नहीं मिलती

हंसते हुए चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनत
रोने को यहाँ वैसे भी फुरसत नहीं मिलती

Wednesday, April 8, 2009

कहीं छत थी, दीवारो-दर थे कहीं
मिला मुझको घर का पता देर से
दिया तो बहुत ज़िन्दगी ने मुझे
मगर जो दिया वो दिया देर से

हुआ न कोई काम मामूल से
गुजारे शबों-रोज़ कुछ इस तरह
कभी चाँद चमका ग़लत वक़्त पर
कभी घर में सूरज उगा देर से

कभी रुक गये राह में बेसबब
कभी वक़्त से पहले घिर आयी शब
हुए बन्द दरवाज़े खुल-खुल के सब
जहाँ भी गया मैं गया देर से

ये सब इत्तिफ़ाक़ात का खेल है
यही है जुदाई, यही मेल है
मैं मुड़-मुड़ के देखा किया दूर तक
बनी वो ख़मोशी, सदा देर से

सजा दिन भी रौशन हुई रात भी
भरे जाम लगराई बरसात भी
रहे साथ कुछ ऐसे हालात भी
जो होना था जल्दी हुआ देर से

भटकती रही यूँ ही हर बन्दगी
मिली न कहीं से कोई रौशनी
छुपा था कहीं भीड़ में आदमी
हुआ मुझमें रौशन ख़ुदा देर से


देखा गया हूँ मैं कभी सोचा गया हूँ मैं
अपनी नज़र में आप तमाशा रहा हूँ मैं

मुझसे मुझे निकाल के पत्थर बना दिया
जब मैं नहीं रहा हूँ तो पूजा गया हूँ मैं

मैं मौसमों के जाल में जकड़ा हुआ दरख़्त
उगने के साथ-साथ बिखरता रहा हूँ मैं

ऊपर के चेहरे-मोहरे से धोखा न खाइए
मेरी तलाश कीजिए, गुम हो गया हूँ मैं


जो हो इक बार, वह हर बार हो ऐसा नहीं होता
हमेशा एक ही से प्यार हो ऐसा नहीं होता

हरेक कश्ती का अपना तज्रिबा होता है दरिया में
सफर में रोज़ ही मंझदार हो ऐसा नहीं होता

कहानी में तो किरदारों को जो चाहे बना दीजे
हक़ीक़त भी कहानी कार हो ऐसा नहीं होता
सिखा देती है चलना ठोकरें भी राहगीरों को
कोई रास्ता सदा दुशवार हो ऐसा नहीं होता

कहीं तो कोई होगा जिसको अपनी भी ज़रूरत हो
हरेक बाज़ी में दिल की हार हो ऐसा नहीं होता

Saturday, October 4, 2008

किस्मत की, बाज़ी का, फ़ैसला तो, हो गया है
फ़ासला भी, खो गया है, देखें किसको कौन मिलता है

जिसको जिसे मिलना है, हर हाल में मिलता है
दुनिया में मुहब्बत ही, किस्मत को बदलती है
ये शम्मा हवाओं में, बुझती नहीं जलती है

कुदरत ही बनाती है हर रिश्ता मुहब्बत का
यूँ भी कभी होता है, अनजान सी राहों में

हर रोज़ नहीं बनती तसवीर मुहब्बत की
जो साँसों में रहता है, जो पलकों में सोता है
वो प्यार जवानी में, इक बार ही होता है

Friday, October 3, 2008

अपना गम लेके कहीं और न जाया जाए
घर में बिखरी हुई चीजों को सजाया जाए

जिन चिरागों को हवाओं का कोई खौफ नहीं
उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाए

बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उडाया जाए

खुदकुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन यूं ही औरों को सताया जाए

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए
अब खुशी है न कोई गम रुलाने वाला  
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला
 
उस को रुखसत तो किया था मुझे मालूम न था  
सारा घर ले गया, घर छोड़ के जाने वाला  
 
इक मुसाफिर के सफर जैसी है सब की दुनिया  
कोई जल्दी में कोई देर से जाने वाला  

एक बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा-चेहरा  
जिस तरफ़ देखिये आने को है आने वाला
दिल मिला और ग़म शनाश मिला
फूल को आग का लिबास मिला

हर शनावर भँवर में डूबा था
जो सितारा मिला उदास मिला

मयकदे के सिवा हमारा पता
उनकी ज़ुल्फ़ों के आस पास मिला

आब-ए-हैवाँ की धूम थी 'साग़र'
सादा पानी का इक गिलास मिला
दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया

ये मैं सौ जाँ से तिरे तर्ज़-ए-तक़ल्लुम के निसार
फिर तो फ़र्माइये क्या आपने इरशाद किया

इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद
इसका ग़म है कि बहुत देर से बरबाद किया

इतना मानूस हूँ फ़ितरत से कली जब चटकी
झुक के मैंने ये कहा मुझसे कुछ इर्शाद किया

मेरी हर साँस है इस बात की शाहिद ऐ मौत
मैंने हर लुत्फ़ के मौक़े पे तुझे याद किया

मुझको तो होश नहीं तुमको ख़बर हो शायद
लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बरबाद किया

कुछ नहीं इसके सिवा 'जोश'  हरीफ़ों का कलाम
वस्ल ने शाद किया हिज्र ने ना-शाद किया
दरीचा बे-सदा कोई नहीं है
अगरचे बोलता कोई नहीं है

रुकूँ तो मंज़िलें हि मंज़िलें हैं
चलूँ तो रास्ता कोई नहीं है

खुली हैं खिड़कियाँ हर घर की लेकिन
गली में झाँकता कोई नहीं है

किसी से आश्ना ऐसा हुआ हूँ
मुझे पहचानता कोई नहीं है

मैं ऐसे जमघटे में खो गया हूँ
जहाँ मेरे सिवा कोई नहीं है
दर्द-ओ-ग़म का न रहा नाम तेरे आने से
दिल को क्या आ गया आराम तेरे आने से

शुक्र सद शुक्र के लबरेज़ हुआ ऐ साक़ी
मय-ए-इशरत से मेरा जाम तेरे आने से

सहर-ए-ईद ख़ज़िल जिससे हो ऐ माह-ए-लकाँ
वस्ल की भुली है ये शाम तेरे आने से


वो करें भी तो किन अल्फ़ाज़ में शिक़वा तेरा
जिनको तेरी निगह-ए-लुत्फ़ ने बरबाद किया
होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है

उनसे नज़रें क्या मिलीं रोशन फ़िज़ाएं हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है

खुलती ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शायरी
झुकती आँखों ने बताया मैकशी क्या चीज़ है

हम लबों से कह न पाए उनसे हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है
मोती हो तो बाँध के रख लूँ प्यार छुपाऊँ कैसे
वो चेहरा है हर चेहरे में उसे भुलाऊँ कैसे 

चाँद नहीं फूल नहीं कोई नहीं उन सा हसीं 
कौन हैं वो क्या नाम है उनका यहाँ बताऊँ कैसे

हो खोया हुआ है हर समाँ यार बिना सूना है जहाँ 
नील गगन के चाँद को बाँहों में ले आऊँ कैसे

ओ हो चाहे जिन्हें मेरी नज़र हाय नहीं उनको ख़बर 
बंद है मन्दिर का दरवाज़ा फूल चढ़ाऊँ कैसे
मुद्दतें बीत गईं तुम नहीं आये अब तक
रास्ता और दिखाओगे न जाने कब तक
जो भी मिलता है वो तुमसा ही नज़र आता है

दिल की तन्हाइयाँ बहलाती हैं यूँ भी ग़म को
जैसे सच मुच ही पुकारा हो तुम्हीं ने हमको
पास आते ही मगर ख़ाब बिखर जाता है

वो हसीं लम्हे जो कल तक थे मुरादों की तरह
आज पलकों पे चमक उठते हैं यादों की तरह
दर्द रह जाता है और वक़्त गुज़र जाता है

भेजते हो कभी गुल को तो कभी शबनम को
तुम कहाँ कैसे हो मालूम है हर मौसम को
चाँद हर शब को तुम्हारी ही ख़बर लाता है
मेरी निगाह छलकता हुआ है पैमाना
निगाह-ए-मय से पिलाऊँ बनाऊँ दीवाना

जो पीने आये हैं उनसे कहो मुझे देखें
मेरा ये शोख़ सरापा है एक मयख़ाना

हर एक नज़र में मेरे शबाब की मस्ती
जिसे भी देख ले मेरी अदा का मस्ताना

ये सारी गर्मी-ए-महफ़िल है मेरे ही दम से
जिसे हो जलना क़रीब आये बन के परवाना

जिधर भी जाऊँ उधर फैलती हैं ख़ुश्बूएं
जो मेरी पाये महक होश से हो बेगाना
लोग मुझे पागल कहते हैं गलियों में बाज़ारों में
मैंने प्यार किया है मुझको चुनवा दो दीवारों में

हर पनघट पर मेरे फ़साने चौपालों में ज़िक्र मेरा
मेरी ही बातें होती हैं बस्ती में चौबारों में

दुनिया वालो कुछ तो मुझको मेरी वफ़ा की दाद मिले
मैंने दिल के फूल के खिलाये शोलों में अंगारों में

गीत है या आहों का धुवाँ है नग़मा है या दिल की तड़प
इतना दर्द कहाँ से आया साज़ों की झंकारों में
जाने क्या हाल हो इस दिल का अगर तू आये
न तो जज़्बात पे न ख़ुद पे ही क़ाबू आये

चार-जानिब तेरी परचाई नज़र आती है
तू ही ख़ुश्बू सा महकता हुआ हर-सू आये

तेरे जलवे की निगाहों को नहीं ताब रही
ऐसा महसूस हुआ चाँद को हम छू आये

तेरी दिलदार निगाहों का दिलासा पा के
मेरी पलकों पे चमकते हुये जुगनू आये
दिल का लगाना खेल न जानो दिल का लगाना मुश्किल है
जिस पर दिल आ जाये उसको दिल से भुलाना मुश्किल है

दिल दीवाना जाने किसका रस्ता तकता रहता है
वो तो शायद था उसका लौट के आना मुश्किल है

पास था जब वो तन्हाई भी अक्सर अच्छी लगती थी
बिछड़ गये तो यूँ लगता है उसको भुलाना मुश्किल है

ग़ज़लों से गीतों से सबको बहलाना तो आसाँ है
हँस हँस कर लेकिन महफ़िल में दर्द को गाना मुश्किल है
आँखों को इंतज़ार का दे के हुनर चला गया
चाहा था एक शख्स को जाने किधर चला गया

दिन की वो महफ़िलें गईं रातों के रतजगे गये
कोई समेट कर मेरे शाम-ओ-सहर चला गया

झोंका है एक बहार का रंग-ए-ख़याल-ए-यार भी
हर-सू बिखर बिखर गई ख़ुश्बू जिधर चला गया

उसके ही दम से दिल में आज धूप भी चाँदनी भी है
दे के वो अपनी याद के शम्स-ओ-क़मर चला गया

कू-ब-कूचा दर-ब-दर कबसे भटक रहा है दिल
हमको भुला के राह वो अपनी डगर चला गया