Wednesday, April 8, 2009

ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक

चाँदनी चार क‍़दम, धूप चली मीलो तक


प्यार का गाँव अजब गाँव है जिसमें अक्सर

ख़त्म होती ही नहीं दुख की गली मीलों तक


प्यार में कैसी थकन कहके ये घर से निकली

कृष्ण की खोज में वृषभानु-लली मीलों तक


घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी

ख़ुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक


माँ के आँचल से जो लिपटी तो घुमड़कर बरसी

मेरी पलकों में जो इक पीर पली मीलों तक


मैं हुआ चुप तो कोई और उधर बोल उठा

बात यह है कि तेरी बात चली मीलों तक


हम तुम्हारे हैं 'कुँअर' उसने कहा था इक दिन

मन में घुलती रही मिसरी की डली मीलों तक


3 comments:

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर said...

khubshurat, narayan narayan

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

सुन्दर ,सशक्त अभिव्यक्ति के लिए शुभकामनायें ,स्वागत आपका ,
लिखते रहिये ,यह तेवर आपको आगे ले जायेंगे
आपका ही
डॉ.भूपेन्द्र

रचना गौड़ ’भारती’ said...

बहुत अच्छा लिखा है . मेरा भी साईट देखे और टिप्पणी दे