Thursday, February 11, 2010

मै रात भर रोशनी को ढूढ़ता रहा, सूरज दिन भर मेरी राह देखता रहा

सागर था मेरे पास पर प्यासा भटकता रहा, शब्द थे मेरे पास फिर भी अटकता रहा | original dil-se

मैं अकेला नहीं चलता,
साथ सवालों के काफिले चलते हैं।

होती हैं ढेरों बातें मन में
खुली आंखों में भी ख्वाब पलते हैं।

मन के आंगन में अक्सर
उमंगों के सूर्या उदय हो ढलते हैं।

करता हूं बातें जब खुद से
कहकर पागल लोग निकलते हैं।

वो क्या जाने दिल समद्र में
कितने लहरों से ख्याल मचलते हैं।

Friday, February 5, 2010

अपने घर में ख़ुद ही आग लगा लेते हैं
पागल हैं हम अपनी नींद उड़ा लेते हैं

जीवन अमृत कब हमको अच्छा लगता है
ज़हर हमें अच्छा लगता है, खा लेते हैं

क़त्ल किया करते हैं कितनी चालाकी से
हम ख़ंजर पर नाम अपना लिखवा लेते हैं

रस नहीं आता है हमको उजला दामन
रुसवाई के गुल-बूटे बनवा लेते हैं

पंछी हैं लेकिन उड़ने से डर लगता है
अक्सर अपने बाल ओ पर कटवा लेते हैं

सत्ता की लालच ने धरती बाँटी लेकिन
अपने सीने पर तमगा लटका लेते हैं

याद नहीं है मुझको भी अब दीन का रस्ता
नाम मुहम्मद का लेकिन अपना लेते हैं

औरों को मुजरिम ठहरा कर अब हम आलम
अपने गुनाहों से छुटकारा पा लेते हैं


नहीं होता कि बढ़कर हाथ रख दें।
तड़पता देखते हैं, दिल हमारा॥

अगर क़ाबू न था दिल पर, बुरा था।
वहाँ जाना सरे-महफ़िल हमारा॥

यह हालत है तो शायद रहम आ जाय।
कोई उसको दिखा दे दिल हमारा॥