Tuesday, November 4, 2008

ढल गया आफ़ताब ऐ साक़ी 
ला पिला दे शराब ऐ साक़ी 

या सुराही लगा मेरे मुँह से 
या उलट दे नक़ाब ऐ साक़ी 

मैकदा छोड़ कर कहाँ जाऊँ 
है ज़माना ख़राब ऐ साक़ी 

जाम भर दे गुनाहगारों के 
ये भी है इक सवाब ऐ साक़ी 

आज पीने दे और पीने दे 
कल करेंगे हिसाब ऐ साक़ी 

No comments: