Friday, April 29, 2011
Thursday, February 11, 2010
Friday, February 5, 2010
अपने घर में ख़ुद ही आग लगा लेते हैं
पागल हैं हम अपनी नींद उड़ा लेते हैं
जीवन अमृत कब हमको अच्छा लगता है
ज़हर हमें अच्छा लगता है, खा लेते हैं
क़त्ल किया करते हैं कितनी चालाकी से
हम ख़ंजर पर नाम अपना लिखवा लेते हैं
रस नहीं आता है हमको उजला दामन
रुसवाई के गुल-बूटे बनवा लेते हैं
पंछी हैं लेकिन उड़ने से डर लगता है
अक्सर अपने बाल ओ पर कटवा लेते हैं
सत्ता की लालच ने धरती बाँटी लेकिन
अपने सीने पर तमगा लटका लेते हैं
याद नहीं है मुझको भी अब दीन का रस्ता
नाम मुहम्मद का लेकिन अपना लेते हैं
औरों को मुजरिम ठहरा कर अब हम आलम
अपने गुनाहों से छुटकारा पा लेते हैं
Wednesday, December 2, 2009
मैं ढूँढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीं नया आसमाँ नहीं मिलता
नई ज़मीं नया आसमाँ भी मिल जाये
नये बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता
वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मेरा
किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता
वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता
जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलता
खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता
तो इक दिन मेरा जी ही जाता रहेगा
मैं जाता हूँ दिल को तेरे पास छोड़े
मेरी याद तुझको दिलाता रहेगा
गली से तेरी दिल को ले तो चला हूँ
मैं पहुँचूँगा जब तक ये आता रहेगा
क़फ़स में कोई तुम से ऐ हम-सफ़ीरों
ख़बर कल की हमको सुनाता रहेगा
ख़फ़ा हो कि ऐ "दर्द" मर तो चला तू
कहाँ तक ग़म अपना छुपाता रहेगा
