Friday, October 3, 2008

ओ मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की, बिन चिठ्ठी बिन तार
छोटा करके देखिये, जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है, बाहों भर संसार

ए लेके तन के नाप को, घूमे बस्ती गाँव
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव
सबकी पूजा एक सी, अलग-वलग हर रीत
मस्जिद जाए मौल्वी, कोयल गाए गीत

पूजा घर में मूर्ती, मीर के संग श्याम
जिसकी जितनी चाकरी, उतने उसके दाम

सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक, भूका रहे फ़कीर
अच्छी संगत बैठकर, संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से, मीठी हो गई धूप

सपना झर्ना नींद का, जागी आँखें प्यास
पाना खोना खोजना, साँसों का इतिहास
चाहे गीता वाचिए, या पढ़िए क़ुरान
मेरा तेरा प्यार ही, हर पुस्तक का ज्ञान
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी

सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी

हर तरफ़ भागते दौड़ते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी

रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
ज: हर नयी दिन नया इंतज़ार आदमी

ज: ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र डर सफ़र
ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र डर सफ़र
आखिरी साँस तक बेक़रार आदमी
जवानी के हीले, हया के बहाने
ये मान के तुम मुझसे पर्दआ करोगी
ये दुनिया मगर तुझसी भोली नहीं है
छुपकर मुहब्बत को रुसवा करोगी

बड़ी कोशिशों से, बड़ी ख़्वाहिशों से
तमन्ना के सहमी हुई साज़िशोण से
मिलेगा जो मौका, तो बेचैन होकर
दरीचों से तुम मुझको देखा करोगी

सतायेगी जब चाँदनी की उदासी
दुखायेगी दिल फ़िज़ा की खमोशी
उफ़क़ की तरफ़ खाली नज़रें जमाकर
कभी जो न सोचा वो सोचा करोगी

कभी दिल की धड़कन महसूस होगी
कभी ठण्डी साँसोण के तूफ़ान उठेंगे
कभी गिर के बिस्तर पे आहें भरोगी
कभी झुक के तकिये पे रोया करोगी
शायद मैं ज़िंदगी की सहर लेके आ गया
कातिल को आज अपने ही घर लेके आ गया

ता-उम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क़ की
अंजाम ये कि गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया

नश्तर है मेरे हाथ में, कंधों पे मयक़दा
लो मैं इलाज-ए-दर्द-ए-जिग़र लेके आ गया

""फ़ाकिर"" सनमकदे में न आता मैं लौटकर
इक Zअख़्म भर गया था इधर लेके आ गया

Sath Sath

तुम को देखा तो ये ख़याल आया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया
तुम को...

आज फिर दिलने एक तमन्ना की - (२)
आज फिर दिलको हमने समझाया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया...

तुम चले जाओगे तो सोचेंगे - (२)
हमने क्या खोया, हमने क्या पाया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया...

हम जिसे गुनगुना नहीं सकते - (२)
वक़्त ने ऐसा गीत क्यूँ गाया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया...
धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो
ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटाकर देखो

वो सितारा चमकने दो यूँही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो

पत्थरों में भी ज़ुबां होती है, दिल होता है
अपने घर के दर-ओ-दीवार सजाकर देखो

फ़ासिला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या ना मिले हाथ बढ़ाकर देखो

Sajda

किस को क़ातिल मैं कहूँ किस को मसीहा समझूँ
सब यहाँ दोस्त ही बैठे हैं किसे क्या समझूँ

वो भी क्या दिन थे के हर वहम यकीन होता था
अब हक़ीकत नज़र आये तो उसे क्या समझूँ

दिल जो टूटा तो कई हाथ दुआ को उठे
ऐसे माहौल में अब किस को पराया समझूँ

ज़ुल्म ये है के है यक़्ता तेरी बेगानारवी
लुत्फ़ ये है के मैं अब तक तुझे अपना समझूँ