Friday, October 3, 2008

मिसाल इसकी कहाँ है ज़माने में
की सारे खोने के गम पाये हमने पाने में

वो शक्ल पिघली तो हर शै में ढल गई जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में

जो मुन्तजिर न मिला वो तो हम है शर्मिन्दा
की हमने देर लगा दी पलट के आने में

लतीफ था वो ताखैय्युल से, ख्वाब से नाज़ुक
गवा दिया हमने ही उसे आज़माने में

समझ लिया था कभी एक सराब को दरिया
पर एक सुकून था हमको फरेब खाने में

झुका दरख्त हवा से, तो आँधियों ने कहा
ज्यादा फर्क नहीं झुक के टूट जाने में

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