Friday, October 3, 2008

मैं भूल जाऊं अब यही मुनासिब है 
मगर भूलना भी चाहूँ तो किस तरह 
भूलूं की तुम तो फिर भी हकीक़त हो कोई ख्वाब नहीं
यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ
कमबख्त
भुला सका न ये सिलसिला जो था ही नहीं
वो इक ख़याल जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात जो मैं कह नहीं सका तुम से
वो एक रब्त 
वो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब
जो कभी हुआ ही नहीं
अगर ये हाल है दिल का तो कोई समझाए
तुम्हें भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूं
की तुम तो फिर भी हकीक़त हो कोई ख्वाब नही

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