मुद्दतें बीत गईं तुम नहीं आये अब तक
रास्ता और दिखाओगे न जाने कब तक
जो भी मिलता है वो तुमसा ही नज़र आता है
दिल की तन्हाइयाँ बहलाती हैं यूँ भी ग़म को
जैसे सच मुच ही पुकारा हो तुम्हीं ने हमको
पास आते ही मगर ख़ाब बिखर जाता है
वो हसीं लम्हे जो कल तक थे मुरादों की तरह
आज पलकों पे चमक उठते हैं यादों की तरह
दर्द रह जाता है और वक़्त गुज़र जाता है
भेजते हो कभी गुल को तो कभी शबनम को
तुम कहाँ कैसे हो मालूम है हर मौसम को
चाँद हर शब को तुम्हारी ही ख़बर लाता है
Friday, October 3, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment