आँखों को इंतज़ार का दे के हुनर चला गया
चाहा था एक शख्स को जाने किधर चला गया
दिन की वो महफ़िलें गईं रातों के रतजगे गये
कोई समेट कर मेरे शाम-ओ-सहर चला गया
झोंका है एक बहार का रंग-ए-ख़याल-ए-यार भी
हर-सू बिखर बिखर गई ख़ुश्बू जिधर चला गया
उसके ही दम से दिल में आज धूप भी चाँदनी भी है
दे के वो अपनी याद के शम्स-ओ-क़मर चला गया
कू-ब-कूचा दर-ब-दर कबसे भटक रहा है दिल
हमको भुला के राह वो अपनी डगर चला गया
Friday, October 3, 2008
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