Saturday, October 4, 2008

मजबूरी के मौसम में भी जीना पड़ता है  
थोडा सा समझौता जानम करना पड़ता है 

कभी कभी कुछ इस हद तक बढ़ जाती है लाचारी 
लगता है ये जीवन जैसे बोझ हो कोई भारी 
दिल कहता है रोएँ लेकिन हंसना पड़ता है 

कभी कभी इतनी धुंधली हो जाती हैं तस्वीरें 
पता नहीं चलता कदमों में कितनी हैं जंजीरें 
पाँव बंधे होते हैं लेकिन चलना पड़ता है 

रूठ के जाने वाले बादल तू आने वाला तारा 
किस को ख़बर किन लम्हों में बन जाए कौन सहारा  
दुनिया जैसी भी हो रिश्ता रखना पड़ता है

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