मजबूरी के मौसम में भी जीना पड़ता है
थोडा सा समझौता जानम करना पड़ता है
कभी कभी कुछ इस हद तक बढ़ जाती है लाचारी
लगता है ये जीवन जैसे बोझ हो कोई भारी
दिल कहता है रोएँ लेकिन हंसना पड़ता है
कभी कभी इतनी धुंधली हो जाती हैं तस्वीरें
पता नहीं चलता कदमों में कितनी हैं जंजीरें
पाँव बंधे होते हैं लेकिन चलना पड़ता है
रूठ के जाने वाले बादल तू आने वाला तारा
किस को ख़बर किन लम्हों में बन जाए कौन सहारा
दुनिया जैसी भी हो रिश्ता रखना पड़ता है
Saturday, October 4, 2008
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