Saturday, October 4, 2008

मौसम को इशारों से बुला क्यूँ नहीं लेते 
रूठा है अगर वो तो मना क्यूँ नहीं लेते 

दीवाना तुम्हारा कोई गैर नहीं है
मचला भी तो सीने से लगा क्यूँ नहीं लेते 

ख़त लिख कर कभी और कभी ख़त को जलाकर 
तन्हाई को रंगीन बना क्यूँ नहीं लेते 

तुम जाग रहे हो मुझ को अच्छा नहीं लगता 
चुपके से मेरी नींद चुरा क्यूँ नहीं लेते

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