Monday, October 13, 2008

क्या उम्मीद करे हम उन से जिन को वफ़ा मालूम नहीं 
गम देना मालूम है लेकिन गम की दवा मालूम नहीं 

जिन की गली में उम्र गँवा दी जीवन भर हैरान रहे 
पास भी आके पास न आए जान के भी अनजान रहे 
कौन सी आख़िर की थी हमने ऎसी खता मालूम नहीं 

ऐ मेरे पागल अरमानों झूठे बन्धन तोड़ भी दो 
ऐ मेरी ज़ख्मी उम्मीदों दिल का दामन छोड़ भी दो 
तुम को अभी इस नगरी में जीने की सज़ा मालूम नहीं 

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