Tuesday, January 27, 2009

हमारे शौक़ की ये इन्तिहा थी
क़दम रखा कि मंज़िल रास्ता थी

कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है
मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी

मोहब्बत मर गई मुझको भी ग़म है
मेरे अच्छे दिनों की आशना थी

जिसे छू लूँ मैं वो हो जाये सोना
तुझे देखा तो जाना बद्दुआ थी

मरीज़े-ख़्वाब को तो अब शफ़ा है
मगर दुनिया बड़ी कड़वी दवा थी

हर ख़ुशी में कोई कमी सी है 
हँसती आँखों में भी नमी सी है 

दिन भी चुप चाप सर झुकाये था 
रात की नफ़्ज़ भी थमी सी है 

किसको समझायेँ किसकी बात नहीं 
ज़हन और दिल में फिर ठनी सी है 

ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई 
गर्द इन पलकों पे जमी सी है 

कह गए हम किससे दिल की बात 
शहर में एक सनसनी सी है 

हसरतें राख हो गईं लेकिन 
आग अब भी कहीं दबी सी है 

अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें
हम उनके लिए ज़िंदगानी लुटा दें

हर एक मोड़ पर हम ग़मों को सज़ा दें
चलो ज़िंदगी को मोहब्बत बना दें

अगर ख़ुद को भूले तो, कुछ भी न भूले
कि चाहत में उनकी, ख़ुदा को भुला दें

कभी ग़म की आँधी, जिन्हें छू न पाए
वफ़ाओं के हम, वो नशेमन बना दें

क़यामत के दीवाने कहते हैं हमसे
शलो उनके चहरे से पर्दा हटा दें

सज़ा दें, सिला दें, बना दें, मिटा दें
मगर वो कोई फ़ैसला तो सुना दें
तसवीर तेरी दिल मेरा बहला न सकेगी
ये तेरी तरह मुझ से तो शर्मा न सकेगी
तसवीर तेरी ...

मैं बात करूँगा तो ये खामोश रहेगी
सीने से लगा लूँगा तो ये कुछ न कहेगी
आराम वो क्या देगी जो तड़पा न सकेगी
तसवीर तेरी ...

ये आँखें हैं ठहरी हुई चंचल वो निगाहें
ये हाथ हैं सहमे हुए और मस्त वो बाहें
पर्छाईं तो इंसान के काम आ न सकेगी
तसवीर तेरी ...

इन होंठों को फ़ैय्याज़ मैं कुछ दे न सकूँगा
इस ज़ुल्फ़ को मैं हाथ में भी ले न सकूँगा
उलझी हुई रातों को ये सुलझा न सकेगी
तसवीर तेरी ...

Thursday, November 27, 2008

Unknown

मरने का तेरे गम में इरादा भी नहीं है,
है इश्क मगर, इतना ज़्यादा भी नहीं है|

है यूकि इबादत की जुबा और है कोई,
कागज मेरी तकदीर का, सदा भी नहीं है|

क्यो देखते रहते है,सितारों की तरफ़ हम,
जब उनसे मुलाकात का वादा भी नहीं है|

क्यो रह के मंजर में उलझ जाती है आँखे,
जब दिल में कोई और इरादा भी नहीं है|

Tuesday, November 4, 2008

कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों है
वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों है
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है
यही होता है तो आख़िर यही होता क्यों है

एक ज़रा हाथ बढ़ा दे तो पकड़ लें दामन
उसके सीने में समा जाए हमारी धड़कन
इतनी क़ुर्बत है तो फिर फ़ासला इतना क्यों है

दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
एक लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई
आस जो टूट गई फिर से बंधाता क्यों है

तुम मसर्रत का कहो या इसे गम़ का रिश्ता
कहते है प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है

उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं 
ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं 

घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँखें मलते हैं 
तमाम रात खजूरों के पेड़ जलते हैं 

मैं शाह राह नहीं, रास्ते का पत्थर हूँ 
यहाँ सवार भी पैदल उतर कर चलते हैं 

उन्हें कभी न बताना मैं उनकी आँखें हूँ 
वो लोग फूल समझकर मुझे मसलते हैं 

ये एक पेड़ है, आ इस से मिलकर रो लें हम 
यहाँ से तेरे मेरे रास्ते बदलते हैं 

कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से 
कहीं भी जाऊँ मेरे साथ साथ चलते हैं