Tuesday, November 4, 2008

उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं 
ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं 

घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँखें मलते हैं 
तमाम रात खजूरों के पेड़ जलते हैं 

मैं शाह राह नहीं, रास्ते का पत्थर हूँ 
यहाँ सवार भी पैदल उतर कर चलते हैं 

उन्हें कभी न बताना मैं उनकी आँखें हूँ 
वो लोग फूल समझकर मुझे मसलते हैं 

ये एक पेड़ है, आ इस से मिलकर रो लें हम 
यहाँ से तेरे मेरे रास्ते बदलते हैं 

कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से 
कहीं भी जाऊँ मेरे साथ साथ चलते हैं

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