Tuesday, November 4, 2008

एक चेहरा साथ साथ रहा जो मिला नहीं 
किसको तलाश करते रहे कुछ पता नहीं 

शिद्दत की धूप तेज़ हवाओं के बावजूद 
मैं शाख़ से गिरा हूँ नज़र से गिरा नहीं 

आख़िर ग़ज़ल का ताजमहल भी है मकबरा 
हम ज़िन्दगी थे हमको किसी ने जिया नहीं 

जिसकी मुखालफ़त हुई मशहूर हो गया 
इन पत्थरों से कोई परिंदा गिरा नहीं 

तारीकियों में और चमकती है दिल की धूप 
सूरज तमाम रात यहां डूबता नहीं 

किसने जलाई बस्तियाँ बाज़ार क्यों लुटे 
मैं चाँद पर गया था मुझे कुछ पता नहीं

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