Saturday, October 4, 2008

आ चांदनी भी मेरी तरह जाग रही है
पलकों पे सितारों को लिए रात खडी है

ये बात की सूरत के भले दिल के बुरे हों
अल्लाह करे झूठ हो बहुतों से सूनी है

वो माथे का मतला हो की होंठों के दो मिसरे
बचपन की ग़ज़ल ही मेरी महबूब रही है

ग़ज़लों ने वहीं जुल्फों के फैला दिए साए
जिन राहों पे देखा है बहुत धूप कडी है

हम दिल्ली भी हो आए हैं लाहौर भी घुमे
ऐ यार मगर तेरी गली तेरी गली है

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