Wednesday, October 15, 2008

मैं जब भी तेज चलता हूँ, नज़ारे छूट जाते हैं,
कोई जब रूप धरता हूँ, तो साँसे टूट जाते है,
मैं रोता हूँ तो आकर लोग कन्धा थपथपाते हैं,
मैं हँसता हूँ तो अक्सर लोग मुझसे रूठ जाते हैं.

बहुत बिखरा बहुत टूटा,थपेडे सह नही पाया,
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह नही पाया,
अधुरा अनसुना ही रह गया ये प्यार का किस्सा,
कभी तू सुन नही पायी कभी मैं कह नही पाया.
तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ

तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ

तुम्हे मै भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नही लेकिन

तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ
"कोई दीवाना कहता है
कोई पागल समझता है 
मगर धरती की बेचैनी को 
बस बदल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ 
तू मुझसे दूर कैसी है 
ये तेरा दिल समझता है 
या मेरा दिल समझता है"

"मोहब्बत एक एहसासों की 
पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था 
कभी मीरा दीवानी थी 
यहाँ सब लोग कहते है 
मेरी आँखों में आंसू है 
जो तू समझे तो मोती है 
जो ना समझे तो पानी है"

"समंदर पीर के अंदर है 
लेकिन रो नहीं सकता 
ये आंसू प्यार का मोती है 
इसको खो नहीं सकता 
मेरी चाहत को दुल्हन तू
बना लेना मगर सुनले 
जो मेरा हो नहीं पाया 
वो तेरा हो नहीं सकता "

भर्मर कोई कुमुदनी पर 
मचल बैठा तो हंगामा 
हमारे दिल में कोई ख्वाब 
पल बैठा तो हंगामा 
अभी तक डूब कर सुनते थे 
सब किस्सा मोहब्बत का 
हम किस्से को हकीक़त में
बदल बैठे तो हंगामा"

Tuesday, October 14, 2008

खिजां के रंग में अभी बहार बाकी है
चिराग-ऐ-सहर है पर इंतज़ार बाकी है

हमें सलाम करो ई हवादिस-ऐ-दौरान 
तुम्हारे साथ हैं फिर भी करार बाकी है

गुज़र चुका है उम्मीदों का काफिला कब का
राह-ऐ-यकीन पे अब भी गुबार बाकी है

हमें पुकार लो जब चाहो हम मिलेंगे वहीं
मिले हैं ख़ाक में लेकिन वकार बाकी है
इक तुम के दिल में दर्द किसी गैर के लिए
इक हम के दर्द बन गए ख़ुद आप के लिए

हम अपने आशियाने में तेरे मुन्तजिर
तुम तिनके चुन रहे थे किसी और के लिए

हम जानते हैं दिल में तुम्हारे नहीं हैं हम
जो ख़त तुम्हारी आंखों में थे हम ने पढ़ लिए

गम है के तू ने लूट लिया ऐतमाद को
इक दाग दे दिए हैं हमें उम्र के लिए
कातिल की इस अदा पे भी कुर्बान जाए

ख़ुद दे के ज़हर आंखों में आंसू भी भर लिए
थी कौन सी खता के मिली जिस की ये सज़ा
हमने तो उम्र भर तेरे न्क़श-ऐ-क़दम लिए

"अजरा" ये माना बोझ है अब तुझ पे जिंदगी
पर जिंदगी तो तेरी नहीं है तेरे लिए

Monday, October 13, 2008

धूप के साथ गया साथ निभाने वाला
अब कहाँ आयेगा वो लौट के आने वाला

रेत पर छोड़ गया नक्श हजारों अपने
किसी पागल की तरह नक्श मिटाने वाला

सब्ज़ शाखें कभी ऐसे टू नहीं चीखती हैं 
कौन आया है परिंदों को डराने वाला

आरिज़-ऐ-शाम की सुर्खी ने किया फाश उसे
परदा-ऐ-अब्र में था आग लगाने वाला

सफर-ऐ-शब का तकाजा है मेरे साथ रहो
दस्त पुर्हौल है तूफ़ान है आने वाला 

मुझ को दर्पर्दा सुनाता रहा किस्सा अपना
अगले वक्तों की हिकायात सुनाने वाला

शबनमी घास घने फूल लाराज़ती किरणें 
कौन आया है खजानों को लुटाने वाला

अब तो आराम करें सोचती आँखें मेरी
रात का आखिरी तारा भी है जाने वाला
क्या उम्मीद करे हम उन से जिन को वफ़ा मालूम नहीं 
गम देना मालूम है लेकिन गम की दवा मालूम नहीं 

जिन की गली में उम्र गँवा दी जीवन भर हैरान रहे 
पास भी आके पास न आए जान के भी अनजान रहे 
कौन सी आख़िर की थी हमने ऎसी खता मालूम नहीं 

ऐ मेरे पागल अरमानों झूठे बन्धन तोड़ भी दो 
ऐ मेरी ज़ख्मी उम्मीदों दिल का दामन छोड़ भी दो 
तुम को अभी इस नगरी में जीने की सज़ा मालूम नहीं