Tuesday, October 14, 2008

इक तुम के दिल में दर्द किसी गैर के लिए
इक हम के दर्द बन गए ख़ुद आप के लिए

हम अपने आशियाने में तेरे मुन्तजिर
तुम तिनके चुन रहे थे किसी और के लिए

हम जानते हैं दिल में तुम्हारे नहीं हैं हम
जो ख़त तुम्हारी आंखों में थे हम ने पढ़ लिए

गम है के तू ने लूट लिया ऐतमाद को
इक दाग दे दिए हैं हमें उम्र के लिए
कातिल की इस अदा पे भी कुर्बान जाए

ख़ुद दे के ज़हर आंखों में आंसू भी भर लिए
थी कौन सी खता के मिली जिस की ये सज़ा
हमने तो उम्र भर तेरे न्क़श-ऐ-क़दम लिए

"अजरा" ये माना बोझ है अब तुझ पे जिंदगी
पर जिंदगी तो तेरी नहीं है तेरे लिए

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