Thursday, November 27, 2008

Unknown

मरने का तेरे गम में इरादा भी नहीं है,
है इश्क मगर, इतना ज़्यादा भी नहीं है|

है यूकि इबादत की जुबा और है कोई,
कागज मेरी तकदीर का, सदा भी नहीं है|

क्यो देखते रहते है,सितारों की तरफ़ हम,
जब उनसे मुलाकात का वादा भी नहीं है|

क्यो रह के मंजर में उलझ जाती है आँखे,
जब दिल में कोई और इरादा भी नहीं है|

Tuesday, November 4, 2008

कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों है
वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों है
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है
यही होता है तो आख़िर यही होता क्यों है

एक ज़रा हाथ बढ़ा दे तो पकड़ लें दामन
उसके सीने में समा जाए हमारी धड़कन
इतनी क़ुर्बत है तो फिर फ़ासला इतना क्यों है

दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
एक लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई
आस जो टूट गई फिर से बंधाता क्यों है

तुम मसर्रत का कहो या इसे गम़ का रिश्ता
कहते है प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है

उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं 
ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं 

घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँखें मलते हैं 
तमाम रात खजूरों के पेड़ जलते हैं 

मैं शाह राह नहीं, रास्ते का पत्थर हूँ 
यहाँ सवार भी पैदल उतर कर चलते हैं 

उन्हें कभी न बताना मैं उनकी आँखें हूँ 
वो लोग फूल समझकर मुझे मसलते हैं 

ये एक पेड़ है, आ इस से मिलकर रो लें हम 
यहाँ से तेरे मेरे रास्ते बदलते हैं 

कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से 
कहीं भी जाऊँ मेरे साथ साथ चलते हैं

कोई काँटा चुभा नहीं होता,
दिल अगर फूल सा नहीं होता,

मैं भी शायद बुरा नहीं होता 
वो अगर बेवफ़ा नहीं होता 

बेवफ़ा बेवफ़ा नहीं होता 
ख़त्म ये फ़ासला नहीं होता 

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी 
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता 

जी बहुत चाहता है सच बोलें 
क्या करें हौसला नहीं होता 

रात का इंतज़ार कौन करे 
आज-कल दिन में क्या नहीं होता 

गुफ़्तगू उन से रोज़ होती है 
मुद्दतों सामना नहीं होता 

कोई काँटा चुभा नहीं होता 
दिल अगर फूल सा नहीं होता 

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता 

गुफ़्तगू उन से रोज़ होती है
मुद्दतों सामना नहीं होता 

जी बहुत चाहता सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता 

रात का इंतज़ार कौन करे
आज कल दिन में क्या नहीं होता

होठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते 
साहिल पे समुंदर के ख़ज़ाने नहीं आते

पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी 
आँखों को अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते 

दिल उजड़ी हुई इक सराये की तरह है 
अब लोग यहाँ रात जगाने नहीं आते 

उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में 
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते 

इस शहर के बादल तेरी ज़ुल्फ़ों की तरह हैं 
ये आग लगाते हैं बुझाने नहीं आते 

अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गये हैं 
आते हैं मगर दिल को दुखाने नहीं आते 

भूल शायद बहुत बड़ी कर ली 
दिल ने दुनिया से दोस्ती कर ली 

तुम मुहब्बत को खेल कहते हो 
हम ने बर्बाद ज़िन्दगी कर ली 

उस ने देखा बड़ी इनायत से 
आँखों आँखों में बात भी कर ली 

आशिक़ी में बहुत ज़रूरी है 
बेवफ़ाई कभी कभी कर ली 

हम नहीं जानते चिराग़ों ने 
क्यों अंधेरों से दोस्ती कर ली 

धड़कनें दफ़्न हो गई होंगी 
दिल में दीवार क्यों खड़ी कर ली 

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
किश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा

बेवक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा

जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं
तुमने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा

पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा

मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला 
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला 

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे 
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला 

तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था 
फिर इसके बाद मुझे कोई अजनबी न मिला 

बहुत अजीब है ये क़ुर्बतों की दूरी भी 
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला 

ख़ुदा की इतनी बड़ी क़ायनात में मैंने 
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वो ही न मिला

जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे 
हज़ारों तरफ़ से निशाने लगे

हुई शाम यादों के इक गाँव में 
परिंदे उदासी के आने लगे 

घड़ी दो घड़ी मुझको पलकों पे रख 
यहाँ आते आते ज़माने लगे 

कभी बस्तियाँ दिल की यूँ भी बसीं 
दुकानें खुलीं, कारख़ाने लगे 

वहीं ज़र्द पत्तों का कालीन है 
गुलों के जहाँ शामियाने लगे 

पढाई लिखाई का मौसम कहाँ 
किताबों में ख़त आने-जाने लगे 

आँखों में रहा दिल में न उतरकर देखा,
कश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा

बेवक़्त अगर जाऊँगा, सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा

जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं,
तुमने मेरा काँटों-भरा बिस्तर नहीं देखा

पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा 

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में 
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में 

और जाम टूटेंगे इस शराब-ख़ाने में 
मौसमों के आने में मौसमों के जाने में 

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं 
उम्र बीत जाती है दिल को दिल बनाने में 

फ़ाख़्ता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकती 
कौन साँप रहता है उसके आशियाने में 

दूसरी कोई लड़की ज़िन्दगी में आयेगी 
कितनी देर लगती है उसको भूल जाने में 

मुझसे बिछड़ के ख़ुश रहते हो 
मेरी तरह तुम भी झूठे हो 

इक टहनी पर चाँद टिका था 
मैं ये समझा तुम बैठे हो 

उजले उजले फूल खिले थे 
बिल्कुल जैसे तुम हँसते हो 

मुझ को शाम बता देती है 
तुम कैसे कपड़े पहने हो 

तुम तन्हा दुनिया से लड़ोगे 
बच्चों सी बातें करते हो

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा ।

इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा ।


हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,

जिस तरफ़ भी चल पड़ेगे, रास्ता हो जाएगा ।


कितना सच्चाई से, मुझसे ज़िंदगी ने कह दिया,

तू नहीं मेरा तो कोई, दूसरा हो जाएगा ।


मैं खूदा का नाम लेकर, पी रहा हूँ दोस्तो,

ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा ।


सब उसी के हैं, हवा, ख़ुश्बु, ज़मीनो-आस्माँ,

मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा ।

न जी भर के देखा न कुछ बात की 
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की 

कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं 
कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की 

उजालों की परियाँ नहाने लगीं 
नदी गुनगुनाई ख़यालात की 

मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई 
ज़ुबाँ सब समझते हैं जज़्बात की 

सितारों को शायद ख़बर ही नहीं 
मुसाफ़िर ने जाने कहाँ रात की 

मुक़द्दर मेरे चश्म-ए-पुर'अब का 
बरसती हुई रात बरसात की 

एक चेहरा साथ साथ रहा जो मिला नहीं 
किसको तलाश करते रहे कुछ पता नहीं 

शिद्दत की धूप तेज़ हवाओं के बावजूद 
मैं शाख़ से गिरा हूँ नज़र से गिरा नहीं 

आख़िर ग़ज़ल का ताजमहल भी है मकबरा 
हम ज़िन्दगी थे हमको किसी ने जिया नहीं 

जिसकी मुखालफ़त हुई मशहूर हो गया 
इन पत्थरों से कोई परिंदा गिरा नहीं 

तारीकियों में और चमकती है दिल की धूप 
सूरज तमाम रात यहां डूबता नहीं 

किसने जलाई बस्तियाँ बाज़ार क्यों लुटे 
मैं चाँद पर गया था मुझे कुछ पता नहीं

जब भी तन्हाई से घबरा के सिमट जाते हैं 
हम तेरी याद के दामन से लिपट जाते हैं

उन पे तूफ़ाँ को भी अफ़सोस हुआ करता है 
वो सफ़ीने जो किनारों पे उलट जाते हैं 

हम तो आये थे रहें शाख़ में फूलों की तरह 
तुम अगर हार समझते हो तो हट जाते हैं 

इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया
वर्ना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया

आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया

रोनेवालों से कह दो उनका भी रोना रोलें
जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया

तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था
तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया

एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें "फ़ाकिर"
हम को हर रोज़ के सदमात ने रोने न दिया

हम तो यूँ अपनी ज़िन्दगी से मिले 
अजनबी जैसे अजनबी से मिले 

हर वफ़ा एक जुर्म हो गोया 
दोस्त कुछ ऐसी बेरुख़ी से मिले 

फूल ही फूल हम ने माँगे थे 
दाग़ ही दाग़ ज़िन्दगी से मिले 

जिस तरह आप हम से मिलते हैं 
आदमी यूँ न आदमी से मिले 

दिल की दीवार-ओ-दर पे क्या देखा 
बस तेरा नाम ही लिखा देखा 

तेरी आँखों में हमने क्या देखा 
कभी क़ातिल कभी ख़ुदा देखा 

अपनी सूरत लगी प्यारी सी 
जब कभी हमने आईना देखा 

हाय अंदाज़ तेरे रुकने का 
वक़्त को भी रुका रुका देखा 

तेरे जाने में और आने में 
हमने सदियों का फ़ासला देखा 

फिर न आया ख़याल जन्नत का 
जब तेरे घर का रास्ता देखा

ढल गया आफ़ताब ऐ साक़ी 
ला पिला दे शराब ऐ साक़ी 

या सुराही लगा मेरे मुँह से 
या उलट दे नक़ाब ऐ साक़ी 

मैकदा छोड़ कर कहाँ जाऊँ 
है ज़माना ख़राब ऐ साक़ी 

जाम भर दे गुनाहगारों के 
ये भी है इक सवाब ऐ साक़ी 

आज पीने दे और पीने दे 
कल करेंगे हिसाब ऐ साक़ी 

अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें
हम उनके लिए ज़िंदगानी लुटा दें 

हर एक मोड़ पर हम ग़मों को सज़ा दें 
चलो ज़िन्दगी को मोहब्बत बना दें 

अगर ख़ुद को भूले तो, कुछ भी न भूले 
कि चाहत में उनकी, ख़ुदा को भुला दें 

कभी ग़म की आँधी, जिन्हें छू न पाये 
वफ़ाओं के हम, वो नशेमन बना दें 

क़यामत के दीवाने कहते हैं हमसे 
चलो उनके चहरे से पर्दा हटा दें 

सज़ा दें, सिला दें, बना दें, मिटा दें 
मगर वो कोई फ़ैसला तो सुना दें 

आज तुम से बिछड़ रहा हूँ 
आज कहता हूँ फिर मिलूँगा तुम से 
तुम मेरा इंतज़ार करती रहो 
आज का ऐतबार करती रहो 

लोग कहते हैं वक़्त चलता है 
और इंसान भी बदलता है 
काश रुक जाये वक़्त आज की रात 
और बदले न कोई आज के बाद 

वक़्त बदले ये दिल न बदलेगा 
तुम से रिश्ता कभी न टूटेगा 
तुम ही ख़ुश्बू हो मेरी साँसों की 
तुम ही मंज़िल हो मेरे सपनों की 

लोग बोते हैं प्यार के सपने 
और सपने बिखर भी जाते हैं 
एक एहसास ही तो है ये वफ़ा 
और एहसास मर भी जाते हैं 

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है 
ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है 

जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है 
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है 

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी 
अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूँ है 

ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब "फ़ाकिर" 
वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है 

आदमी आदमी को क्या देगा 
जो भी देगा वही ख़ुदा देगा 

मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिब है 
क्या मेरे हक़ में फ़ैसला देगा 

ज़िन्दगी को क़रीब से देखो 
इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा 

हमसे पूछो दोस्ती का सिला 
दुश्मनों का भी दिल हिला देगा 

इश्क़ का ज़हर पी लिया "फ़ाकिर" 
अब मसीहा भी क्या दवा देगा 

यह न सोचो कल क्या हो
कौन कहे इस पल क्या हो

रोओ मत, न रोने दो
ऐसी भी जल-थल क्या हो

बहती नदी की बांधे बांध
चुल्लू मे हलचल क्या हो

हर छन हो जब आस बना
हर छन फ़िर निर्बल क्या हो

रात ही गर चुपचाप मिले
सुबह फ़िर चंचल क्या हो

आज ही आज की कहें-सुने
क्यो सोचे कल, कल क्या हो

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली

जितना-जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली


रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी

आँखें हँस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली


जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज सुनी

जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली


मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर

दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली


होंठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे

जलती-बुझती आँखों में, सादा सी जो बात मिली

पूछते हो तो सुनो, कैसे बसर होती है

रात खैरात की, सदके की सहर होती है


साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब

दिल ही दुखता है, न अब आस्तीं तर होती है


जैसे जागी हुई आँखों में, चुभें काँच के ख्वाब

रात इस तरह, दीवानों की बसर होती है


गम ही दुश्मन है मेरा गम ही को दिल ढूँढता है

एक लम्हे की ज़ुदाई भी अगर होती है


एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती खुशबू

कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है


दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ

बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है


काम आते हैं न आ सकते हैं बेज़ाँ अल्फ़ाज़

तर्ज़मा दर्द की खामोश नज़र होती है

यूँ तेरी रहगुज़र से दिवानावर गुज़रे

काँधे पे अपने रख़ के अपना मजा़र गुज़रे


बैठे रहे हैं रास्ता में दिल का खानदार सजा़ कर

शायद इसी तरफ़ से एक दिन बहार गुज़रे


बहती हुई ये नदिया घुलते हुए किनारे

कोई तो पार उतरे कोई तो पार गुज़रे


तू ने भी हम को देखा हमने भी तुझको देखा

तू दिल ही हार गुज़रा हम जान हार गुज़रे

आगाज़ तॊ होता है अंजाम नहीं होता

जब मेरी कहानी में वॊ नाम नहीं होता

जब जुल्फ़ की कालिख़ में घुल जाए कोई राही

बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं हॊता

हँस हँस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकडे़

हर शख्स़ की किस्मत में ईनाम नहीं होता

बहते हुए आँसू ने आँखॊं से कहा थम कर

जो मय से पिघल जाए वॊ जाम नहीं होता

दिन डूबे हैं या डूबे बारात लिये कश्ती

साहिल पर मगर कोई कोहराम नहीं होता

ये रात ये तन्हाई

ये दिल के धड़कने की आवाज़


ये सन्नाटा

ये डूबते तारॊं की


खा़मॊश गज़ल खवानी

ये वक्त की पलकॊं पर


सॊती हुई वीरानी

जज्बा़त ऎ मुहब्बत की


ये आखिरी अंगड़ाई

बजाती हुई हर जानिब


ये मौत की शहनाई

सब तुम कॊ बुलाते हैं


पल भर को तुम आ जाओ

बंद होती मेरी आँखों में


मुहब्बत का

एक ख्वाब़ सजा जाओ

चाँद तन्हा है आसमां तन्हा,

दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा

बुझ गई आस छुप गया तारा,

थरथराता रहा धुँआ तन्हा

जिंदगी क्या इसी को कहते हैं,

जिस्म तन्हा है और जान तन्हा

हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी,

दोनों चलते रहें तन्हा तन्हा

जलती बुझती सी रोशनी के परे,

सिमटा सिमटा सा एक मकां तन्हा

राह देखा करेगा सदियॊं तक

छॊड़ जाएगें ये जहाँ तन्हा

मेरा माज़ी
मेरी तन्हाई का ये अंधा शिगाफ़
ये के सांसों की तरह मेरे साथ चलता रहा
जो मेरी नब्ज़ की मानिन्द मेरे साथ जिया
जिसको आते हुए जाते हुए बेशुमार लम्हे
अपनी संगलाख़ उंगलियों से गहरा करते रहे, करते गये
किसी की ओक पा लेने को लहू बहता रहा
किसी को हम-नफ़स कहने की जुस्तुजू में रहा
कोई तो हो जो बेसाख़्ता इसको पहचाने
तड़प के पलटे, अचानक इसे पुकार उठे
मेरे हम-शाख़
मेरे हम-शाख़ मेरी उदासियों के हिस्सेदार
मेरे अधूरेपन के दोस्त
तमाम ज़ख्म जो तेरे हैं
मेरे दर्द तमाम
तेरी कराह का रिश्ता है मेरी आहों से
तू एक मस्जिद-ए-वीरां है, मैं तेरी अज़ान
अज़ान जो अपनी ही वीरानगी से टकरा कर
थकी छुपी हुई बेवा ज़मीं के दामन पर
पढ़े नमाज़ ख़ुदा जाने किसको सिज़दा करे

कुछ छोटे सपनो के बदले ,

बड़ी नींद का सौदा करने ,

निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे !

वही प्यास के अनगढ़ मोती ,

वही धूप की सुर्ख कहानी ,

वही आंख में घुटकर मरती ,

आंसू की खुद्दार जवानी ,

हर मोहरे की मूक विवशता ,चौसर के खाने क्या जाने

हार जीत तय करती है वे , आज कौन से घर ठहरेंगे .

निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे !


कुछ पलकों में बंद चांदनी ,

कुछ होठों में कैद तराने ,

मंजिल के गुमनाम भरोसे ,

सपनो के लाचार बहाने ,

जिनकी जिद के आगे सूरज, मोरपंख से छाया मांगे ,

उन के भी दुर्दम्य इरादे , वीणा के स्वर पर ठहरेंगे .

निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे

अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसू के संग होते हैं,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं,सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार-बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं,
जब ऊँच-नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।


जब पोथे खाली होते है, जब हर सवाली होते हैं,
जब गज़लें रास नही आती, अफ़साने गाली होते हैं,
जब बासी फीकी धूप समेटे दिन जल्दी ढल जता है,
जब सूरज का लश्कर चाहत से गलियों में देर से जाता है,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है,
जब कालेज से घर लाने वाली पहली बस छुट जाती है,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है,
जब लाख मन करने पर भी पारो पढ़ने आ जाती है,
जब अपना हर मनचाहा काम कोई लाचारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।


जब कमरे में सन्नाटे की आवाज़ सुनाई देती है,
जब दर्पण में आंखों के नीचे झाई दिखाई देती है,
जब बड़की भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,
क्या लिखते हो दिन भर, कुछ सपनों का भी सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हमें बुलाते है,हम जाते हैं,घबराते हैं,
जब साड़ी पहने एक लड़की का फोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमें मनाती हैं, फोटो दिखलाया जाता है,
जब सारे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।


दीदी कहती हैं उस पगली लडकी की कुछ औकात नहीं,
उसके दिल में भैया तेरे जैसे प्यारे जज़्बात नहीं,
वो पगली लड़की एक दिन मेरे लिए भूखी रहती है,
चुप चुप सारे व्रत करती है, मगर मुझसे कुछ ना कहती है,
जो पगली लडकी कहती है, हाँ प्यार तुझी से करती हूँ,
लेकिन मैं हूँ मजबूर बहुत, अम्मा-बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लड़की पर अपना कुछ अधिकार नहीं बाबा,
ये कथा-कहानी-किस्से हैं, कुछ भी सार नहीं बाबा,
बस उस पगली लडकी के संग जीना फुलवारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है |||

आँख खुलते ही तुम छुप गये हो कहाँ
तुम अभी थे यहाँ, तुम अभी थे यहाँ

अभी साँसों की खुश्बू हवाओन में है
अभी कदमों की आहट फ़िज़ाओं में है
अभी शाखों पे है उंगलियों के निशाँ
तुम अभी थे यहाँ, तुम अभी थे यहाँ
आँख खुलते ही तुम ...

तुम जुदा होके भी मेरी राहों में हो
गर्म अश्कों में हो, सर्द आहों में हो
चाँदनी में झलकती हैं पर्छाइयाँ
तुम अभी थे यहाँ, तुम अभी थे यहाँ
आँख खुलते ही तुम ...
आँचल में सजा लेना कलियाँ, ज़ुल्फ़ों में सितारे भर लेना
ऐसे ही कभी जब शाम ढले, तब याद हमें भी कर लेना
आँचल में सजा लेना कलियाँ

आया था यहाँ बेगाना सा
आया था यहाँ बेगाना सा, चल दूंगा कहीं दीवाना सा
चल दूंगा कहीं दीवाना सा
दीवाने की खातिर तुम कोई, इल्ज़ाम ना अपने सर लेना
ऐसे ही कभी जब शाम ढले, तब याद हमें भी कर लेना
आँचल में सजा लेना कलियाँ

रस्ता जो मिले अंजान कोई
रस्ता जो मिले अंजान कोई, आ जाए अगर तूफ़ान कोई
आ जाए अगर तूफ़ान कोई
अपने को अकेला जान के तुम
आँखों में न आंसू भर लेना
ऐसे ही कभी जब शाम ढले, तब याद हमें भी कर लेना
आँचल में सजा लेना कलियाँ