ग़म नहीं जो तन से निकल दिल गया
मिल गये तुम मुझको सब कुछ मिल गया
दाग़-ए-ग़म रोज़-ए-अज़ल ही मिल गया
तन में जाँ आने से पहले दिल गया
ऐ निगाह-ए-यास तेरा हो बुरा
घर तलक रोता हुआ क़ातिल गया
मरहले तय कुंज-ए-उज़्लत में किये
बैठे बैठे सैकड़ों मंज़िल गया
आई जब सहरा में ख़ुश-चश्मों की याद
सामने नरगिस का तख़्ता खिल गया
वा-ए-क़िस्मत ग़ाफ़िल आया मैं 'अमीर'
उम्र भर ग़ाफ़िल रहा ग़ाफ़िल गया
Friday, October 3, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment