हवा चली थी कुछ ऐसी बिखर गये होते
रगों में ख़ून न होता तो मर गये होते
ये सर्द हवा ये आवारगी ये नींद का बोझ
हम अपने शहर में होते तो घर गये होते
हमीं ने रोक लिये अपने सर पे ये इल्ज़ाम
वगरना शहर में किस किस के सर गये होते
हमीं ने ज़ख़्म-ए-दिल-ओ-जाँ छिपा लिया वरना
न जाने कितनों के चेहरे उतर गये होते
सुकून-ए-दिल को न इस तरह तरसते हम
तेरे करम से जो बच कर गुज़र गये होते
Friday, October 3, 2008
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