हक़-ए-वफ़ा जो हम जताने लगे
आप कुछ कह के मुस्कुराने लगे
हमको जीना पड़ेगा फ़ुर्क़त में
वो अगर हिम्मत आज़माने लगे
डर है मेरी ज़ुबाँ न खुल जाये
अब वो बातें बहुत बताने लगे
जान बचती नज़र नहीं आती
ग़ैर उल्फ़त बहुत जताने लगे
तुमको करना पड़ेगा उज्र वफ़ा
हम अगर दर्द-ए-दिल सुनाने लगे
बहुत मुश्किल है शेवा-ए-तस्लीम
हम भी आख़िर को जी चुराने लगे
वक़्त-ए-रुख़्सत था सख़्त ''हाली'' पर
हम भी बैठे थे जब वो जाने लगे
Friday, October 3, 2008
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