हम कि ठहरे अजनबी इतनी मदारातों के बाद
फिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बाद
कब नज़र में आयेगी बेदाग़ सब्ज़े की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद
थे बहुत बे-दर्द ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के
थीं बहुत बेसब्र सुबहें मेहरबाँ रातों के बाद
दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बाद
उनसे जो कहने गये थे 'फ़ैज़' जाँ-सदक़े किये
अनकही ही रह गई वो बात सब बातों के बाद
Friday, October 3, 2008
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