Friday, October 3, 2008

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला
वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला

क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उसके
वो जो इक शख्स है मुँह फेर के जाने वाला

मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख़ाब की ताबीर बताने वाला

तुम तकल्लुफ़ को भी इख़लास समझते हो 'फ़राज़'
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला

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