Wednesday, October 15, 2008

मैं जब भी तेज चलता हूँ, नज़ारे छूट जाते हैं,
कोई जब रूप धरता हूँ, तो साँसे टूट जाते है,
मैं रोता हूँ तो आकर लोग कन्धा थपथपाते हैं,
मैं हँसता हूँ तो अक्सर लोग मुझसे रूठ जाते हैं.

बहुत बिखरा बहुत टूटा,थपेडे सह नही पाया,
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह नही पाया,
अधुरा अनसुना ही रह गया ये प्यार का किस्सा,
कभी तू सुन नही पायी कभी मैं कह नही पाया.
तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ

तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ

तुम्हे मै भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नही लेकिन

तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ
"कोई दीवाना कहता है
कोई पागल समझता है 
मगर धरती की बेचैनी को 
बस बदल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ 
तू मुझसे दूर कैसी है 
ये तेरा दिल समझता है 
या मेरा दिल समझता है"

"मोहब्बत एक एहसासों की 
पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था 
कभी मीरा दीवानी थी 
यहाँ सब लोग कहते है 
मेरी आँखों में आंसू है 
जो तू समझे तो मोती है 
जो ना समझे तो पानी है"

"समंदर पीर के अंदर है 
लेकिन रो नहीं सकता 
ये आंसू प्यार का मोती है 
इसको खो नहीं सकता 
मेरी चाहत को दुल्हन तू
बना लेना मगर सुनले 
जो मेरा हो नहीं पाया 
वो तेरा हो नहीं सकता "

भर्मर कोई कुमुदनी पर 
मचल बैठा तो हंगामा 
हमारे दिल में कोई ख्वाब 
पल बैठा तो हंगामा 
अभी तक डूब कर सुनते थे 
सब किस्सा मोहब्बत का 
हम किस्से को हकीक़त में
बदल बैठे तो हंगामा"

Tuesday, October 14, 2008

खिजां के रंग में अभी बहार बाकी है
चिराग-ऐ-सहर है पर इंतज़ार बाकी है

हमें सलाम करो ई हवादिस-ऐ-दौरान 
तुम्हारे साथ हैं फिर भी करार बाकी है

गुज़र चुका है उम्मीदों का काफिला कब का
राह-ऐ-यकीन पे अब भी गुबार बाकी है

हमें पुकार लो जब चाहो हम मिलेंगे वहीं
मिले हैं ख़ाक में लेकिन वकार बाकी है
इक तुम के दिल में दर्द किसी गैर के लिए
इक हम के दर्द बन गए ख़ुद आप के लिए

हम अपने आशियाने में तेरे मुन्तजिर
तुम तिनके चुन रहे थे किसी और के लिए

हम जानते हैं दिल में तुम्हारे नहीं हैं हम
जो ख़त तुम्हारी आंखों में थे हम ने पढ़ लिए

गम है के तू ने लूट लिया ऐतमाद को
इक दाग दे दिए हैं हमें उम्र के लिए
कातिल की इस अदा पे भी कुर्बान जाए

ख़ुद दे के ज़हर आंखों में आंसू भी भर लिए
थी कौन सी खता के मिली जिस की ये सज़ा
हमने तो उम्र भर तेरे न्क़श-ऐ-क़दम लिए

"अजरा" ये माना बोझ है अब तुझ पे जिंदगी
पर जिंदगी तो तेरी नहीं है तेरे लिए

Monday, October 13, 2008

धूप के साथ गया साथ निभाने वाला
अब कहाँ आयेगा वो लौट के आने वाला

रेत पर छोड़ गया नक्श हजारों अपने
किसी पागल की तरह नक्श मिटाने वाला

सब्ज़ शाखें कभी ऐसे टू नहीं चीखती हैं 
कौन आया है परिंदों को डराने वाला

आरिज़-ऐ-शाम की सुर्खी ने किया फाश उसे
परदा-ऐ-अब्र में था आग लगाने वाला

सफर-ऐ-शब का तकाजा है मेरे साथ रहो
दस्त पुर्हौल है तूफ़ान है आने वाला 

मुझ को दर्पर्दा सुनाता रहा किस्सा अपना
अगले वक्तों की हिकायात सुनाने वाला

शबनमी घास घने फूल लाराज़ती किरणें 
कौन आया है खजानों को लुटाने वाला

अब तो आराम करें सोचती आँखें मेरी
रात का आखिरी तारा भी है जाने वाला
क्या उम्मीद करे हम उन से जिन को वफ़ा मालूम नहीं 
गम देना मालूम है लेकिन गम की दवा मालूम नहीं 

जिन की गली में उम्र गँवा दी जीवन भर हैरान रहे 
पास भी आके पास न आए जान के भी अनजान रहे 
कौन सी आख़िर की थी हमने ऎसी खता मालूम नहीं 

ऐ मेरे पागल अरमानों झूठे बन्धन तोड़ भी दो 
ऐ मेरी ज़ख्मी उम्मीदों दिल का दामन छोड़ भी दो 
तुम को अभी इस नगरी में जीने की सज़ा मालूम नहीं 
खामोशी ख़ुद अपनी सदा हो ऐसा भी हो सकता है 
सन्नाटा ही गूंज रहा हो ऐसा भी हो सकता है 

मेरा माझी मुझ से बिछड़ कर क्या जाने किस हाल में है 
मेरी तरह वो भी तनहा हो ऐसा भी हो सकता है 

सहारा सहारा कब तक मैं ढूंडूं  उल्फत का एक आलम 
आलम आलम इक सहारा हो ऐसा भी हो सकता है 

अहल-ऐ-तूफ़ान सोच रहे हैं साहिल डूबा जाता है 
ख़ुद उन का दिल दूब रहा हो ऐसा भी हो सकता है
जीते रहने की सज़ा दे जिंदगी ऐ जिंदगी  
अब तो मरने की दुआ दे जिंदगी ऐ जिंदगी 

मैं तो अब उकता गया हूँ क्या यही है कायनात 
बस ये आईना हटा दे जिंदगी ऐ जिंदगी 

ढूडने े निकला था तुझ को और ख़ुद को खो दिया 
तू ही अब मेरा पता दे जिंदगी ऐ जिंदगी 

या मुझे एहसास की इस क़ैद से कर दे रिहा  
वरना दीवाना बना दे जिंदगी ऐ जिंदगी 

Wednesday, October 8, 2008

ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था
दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था

मुआफ़ कर ना सकी मेरी ज़िन्दगी मुझको
वो एक लम्हा कि मैं तुझसे तंग आया था

शगुफ़्ता फूल सिमट कर कली बने जैसे
कुछ इस तरह से तूने बदन चुराया था

गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह
अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था

पता नहीं कि मेरे बाद उनपे क्या गुज़री
मैं चाँद ख्वाब ज़माने में छोड़ आया था
तू मेरे साथ चल न पाएगी
जब मेरी राह तेरी राह से मिलती ही नहीं
फिर मेरा साथ निभाने की ज़रूरत क्या है
अपनी मासूम तमन्नाओं को रैबार ना बना
ख़्वाब फिर ख़्वाब हैं लबों की हक़ीकत क्या है
ये नई राह तुझे रास नहीं आएगी

मैने माना कि तुझे मुझसे मुहब्बत है मगर
मेरी गुर्बत तेरी चाहत का दिला क्या देगी
अपनी मेहरुमि-ए-किस्मत से परेशान हूँ मैं
बेबसी अश्क़-ए-नदामत के सिवा क्या देगी
वक़्त की धूप में हर चीज़ झुलस जएगी
तू मेरे साथ चल न पाएगी
तुम आज हँसते हो हँस लो मुझ पर
ये आज़माइश ना बार होगी
मैं जानता हूँ मुझे खबर है
कि कल फ़ज़ा खुशगवार होगी

रहे मुहब्बत में ज़िन्दगी भर
रहेगी ये कशमकश बराबर
ना तुमको क़ुरबत में जीत होगी
ना मुझको फ़ुरक़त में हार होगी

हज़ार उल्फ़त सताये लेकिन
मेरे इरादों से है ये मुमकिन
अगर शराफ़त को तुमने छेड़ा
तो ज़िन्दगी तुम पे वार होगी
बदले बदले मेरे सरकर नज़र आते हैं
घर की बरबादी के आसार नज़र आते हैं

मेरे मालिक ने मुहब्बत का चलन छोड़ दिया
कर के बरबाद उम्मीदों का चमन छोड़ दिया
फूल भी अब तो ख़ार नज़र आते हैं

डूबे रहते थे मेरे प्यार में जो शाम-ओ-सहर
मेरे चेहरे से नहीं हटती थी कभी जिनकी नज़र
मेरी सूरत से ही बेज़ार नज़र आते हैं

Saturday, October 4, 2008

दिल ग़म से जल रहा है जले, पर धुआँ न हो
मुमकिन है इसके बाद कोई, इम्तेहां न हो

दुनिया तो क्या ख़ुदा से भी घबराके कह दिया 
वह महर्बां नहीं तो कोई महर्बां न हो

लूटा ख़ुशी ने आग लगा दी बहार ने 
बरबाद इस तरह भी किसी का जहाँ न हो

अब तो वहीं सुकूं मिलेगा मुझे जहाँ 
ये संगदिल ज़मीं न हो, आस्मां न हो

दिल ग़म से जल रहा है जले, पर धुआँ न हो
अरे देखी ज़माने की यारी
बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी
क्या ले के मिलें अब दुनिया से, आँसू के सिवा कुछ पास नहीं
या फूल ही फूल थे दामन में, या काँटों की भी आस नहीं
मतलब की दुनिया है सारी
बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी

वक़्त है महरबां, आरज़ू है जवां
फ़िक्र कल की करें, इतनी फ़ुर्सत कहाँ

दौर ये चलता रहे रंग उछलता रहे
रूप मचलता रहे, जाम बदलता रहे

रात भर महमाँ हैं बहारें यहाँ
रात गर ढल गयी फिर ये खुशियाँ कहाँ
पल भर की खुशियाँ हैं सारी
बढ़ने लगी बेक़रारी बढ़ने लगी बेक़रारी
अरे देखी ज़माने की यारी
बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी

उड़ जा उड़ जा प्यासे भँवरे, रस ना मिलेगा ख़ारों में
कागज़ के फूल जहाँ खिलते हैं, बैठ ना उन गुलज़ारो में
नादान तमन्ना रेती में, उम्मीद की कश्ती खेती है
इक हाथ से देती है दुनिया, सौ हाथों से लेती है
ये खेल है कब से जारी
बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी
मौसम को इशारों से बुला क्यूँ नहीं लेते 
रूठा है अगर वो तो मना क्यूँ नहीं लेते 

दीवाना तुम्हारा कोई गैर नहीं है
मचला भी तो सीने से लगा क्यूँ नहीं लेते 

ख़त लिख कर कभी और कभी ख़त को जलाकर 
तन्हाई को रंगीन बना क्यूँ नहीं लेते 

तुम जाग रहे हो मुझ को अच्छा नहीं लगता 
चुपके से मेरी नींद चुरा क्यूँ नहीं लेते
मजबूरी के मौसम में भी जीना पड़ता है  
थोडा सा समझौता जानम करना पड़ता है 

कभी कभी कुछ इस हद तक बढ़ जाती है लाचारी 
लगता है ये जीवन जैसे बोझ हो कोई भारी 
दिल कहता है रोएँ लेकिन हंसना पड़ता है 

कभी कभी इतनी धुंधली हो जाती हैं तस्वीरें 
पता नहीं चलता कदमों में कितनी हैं जंजीरें 
पाँव बंधे होते हैं लेकिन चलना पड़ता है 

रूठ के जाने वाले बादल तू आने वाला तारा 
किस को ख़बर किन लम्हों में बन जाए कौन सहारा  
दुनिया जैसी भी हो रिश्ता रखना पड़ता है
जिंदगी तुझ से मिल कर ज़माना हुआ
आ तुझे आज हम मैकदे ले चलें
रात के नाम होंठों के सागर लिखें
अपनी आँखों में कुछ रात-जगे ले चलें
क्या हसीन लोग हैं

आँख आहों की हैं और लब पंख्ड़ी 
इन की आराइश-ए-खल-ओ-ख़त के लिए
अपनी आँखों के हम आईने ले चलें
अजनबी चहरे में दोस्त बनाते नहीं
रिश्ते-नातों की चांदी बरसती नहीं

कुर्बतें सोहाबतें जिन की याद आयेंगी
ऐसे कुछ दोस्तों के पते ले चलें
उन की आँखों ने जलाते सुलगते हुए
मंज़रों के सिवा कुछ भी देखा नहीं
चेहरा-ए-अफ़सोस के सकिनों के लिए
फूल-ओ-खुश्बू सबा जाम-जामें ले चलें

जिंदगी तुझ से मिल कर ज़माना हुआ
अपने चहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे 
तेरी मर्जी की मुताबिक नज़र आयें कैसे 

घर सजाने का तस्सवुर तो बहुत बाद का है 
पहले ये तय हो की इस घर को बचाएँ कैसे 

कह-कहा आँख की बरताव बदल देता है 
हंसनेवाले तुझे आंसू नज़र आयें कैसे 

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा  
एक कतरे को समुन्दर नज़र आयें कैसे
हम से आया न गया तुम से बुलाया ना गया
फ़ासला प्यार में दोनों से मिटाया ना गया

वो घड़ी याद है जब तुम से मुलाक़ात हुई
एक इशारा हुआ दो हाथ बढ़े बात हुई
देखते देखते दिन ढल गया और रात हुई
वो समां आज तलक दिल से भुलाया ना गया
हम से आया न गया

क्या ख़बर थी के मिले हैं तो बिछड़ने के लिये
क़िस्मतें अपनी बनाईं हैं बिगड़ने के लिये
प्यार का बाग बसाया था उजड़ने के लिये
इस तरह उजड़ा के फिर हम से बसाया ना गया
हम से आया न गया

याद रग जाती है और वक़्त गुज़र जाता है
फूल खिलता है मगर खिल के बिखर जाता है
सब चले जाते हैं फिर दर्दे जिगर जाता है
दाग़ जो तूने दिया दिल ने मिटाया ना गया
हम से आया न गया ...
दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है

हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही, ये माजरा क्या है

मैं भी मुह में ज़ुबान रखता हूँ
काश पूछो की मुद्द क्या है

जबकि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है

ये परी-चेहरा लोग कैसे हैं
ग़मज़ा-ओ-उश्‍वा-ओ-अदा क्या है

शिकने-ज़ुलफ़े-अमबरी क्या है
निगाहे-चश्मे-सुरम सा क्या है

सब्ज़-ओ-गुल कहाँ से आये हैं
अब्र क्या चीज़ है, हवा क्या है

हमको उनसे वफ़ा कि है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

हाँ भला कर, तेरा भला होगा
और दरवेश की सदा क्या है

जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है

मैने माना कि कुछ नहीं ``ग़ालिब''
मुफ़्त हाथ आये, तो बुरा क्या है
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
ग़म की दुनिया से दिल भर गया
ढूँढ ले अब कोई घर नया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल

चल जहाँ गम के मारे न हों
झूठी आशा के तारे न हों
झूठी आशा के तारे न हों
इन बहारों से क्या फ़ायदा
जिस में दिल की कली जल गई
ज़ख़्म फिर से हरा हो गया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल

चार आँसू कोई रो दिया
फेर के मुँह कोई चल दिया
फेर के मुँह कोई चल दिया
लुट रहा था किसी का जहाँ
देखती रह गई ये ज़मीं
चुप रहा बेरहम आसमां
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
सुरमैइ रात है सितारे हैं
आज दोनों जहाँ हमारे हैं

सुबह का इंतेज़ार कौन करे 
सुबह का इंतेज़ार कौन करे

फिर यह रुत यह समा मिले न मिले
आर्ज़ू का चमन खिले न खिले
वक़्त का ऐतबार कौन करे
सुबह का इंतेज़ार कौन करे

ले भी लो हम को अपनी बाहों में
रूह बेचैन है निगाहों में
इल्तेजा बार बार कौन करे
सुबह का इंतेज़ार कौन करे

नई रात ढलती जाती है
रूह ग़म से पिघलती जाती है

तेरी ज़ुल्फ़ों से प्यार कौन करे
अब तेरा इंतज़ार कौन करे

तुम को अपना बना के देख लिया
एक बार आज़मा के देख लिया
बार बार ऐतबार कौन करे
अब तेरा इंतज़ार कौन करे

ऐ दिल-ए-ज़ार सोग़वार न हो
उनकी चाहत में बेक़रार न हो
हाय, बदनसीबों से प्यार कौन करे
अब तेरा इंतज़ार कौन करे
अब किसे चाहें किसे दुंदा करें
वो भी आखिर मिल गया अब क्या करें

हलकी हलकी बारिशें  होती  रहें 
हम भी फूलों की तरह भीगा करें
आँख मूंदे उस गुलाबी धूप में 
देर तक बैठे उसे सोचा करें 

दिल मुहब्बत दीन दुनिया शायरी
हर दरीचे से तुझे देखा करें

घर नया कपडे नए बर्तन नए
इन पुराने कागजों का क्या करें  
आस होगी न आसरा होगा
आने वाले दिनों में क्या होगा

मैं तुझे भूल जाऊँगा इक दिन
वक़्त सब कुछ बदल चुका होगा

नाम हम ने लिखा था आंखों में
आंसूओं ने मिटा दिया होगा

आसमान भर गया परिंदों से
पेड़ कोई हरा गिरा होगा

कितना दुश्वार था सफर उस का
वो सर-ऐ-शाम सो गया होगा
आंसूओं की जहाँ पायमाली रही
ऎसी बस्ती चरागों से खाली रही

दुश्मनों की तरह उस से लड़ते रहे
अपनी चाहत भी कितनी निराली रही

जब कभी भी तुम्हारा ख़याल आ गया
फिर कई रोज़ तक बेखयाली रही

लब तरसते रहे इक हँसी के लिए
मेरी कश्ती मुसाफिर से खाली रही

चाँद तारे साभी हमसफ़र थे मगर
जिंदगी रात थी रात काली रही

मेरे सीने पे खुश्बू ने सर रख दिया
मेरी बांहों में फूलों की डाली रही
आ चांदनी भी मेरी तरह जाग रही है
पलकों पे सितारों को लिए रात खडी है

ये बात की सूरत के भले दिल के बुरे हों
अल्लाह करे झूठ हो बहुतों से सूनी है

वो माथे का मतला हो की होंठों के दो मिसरे
बचपन की ग़ज़ल ही मेरी महबूब रही है

ग़ज़लों ने वहीं जुल्फों के फैला दिए साए
जिन राहों पे देखा है बहुत धूप कडी है

हम दिल्ली भी हो आए हैं लाहौर भी घुमे
ऐ यार मगर तेरी गली तेरी गली है
किस्मत की, बाज़ी का, फ़ैसला तो, हो गया है
फ़ासला भी, खो गया है, देखें किसको कौन मिलता है

जिसको जिसे मिलना है, हर हाल में मिलता है
दुनिया में मुहब्बत ही, किस्मत को बदलती है
ये शम्मा हवाओं में, बुझती नहीं जलती है

कुदरत ही बनाती है हर रिश्ता मुहब्बत का
यूँ भी कभी होता है, अनजान सी राहों में

हर रोज़ नहीं बनती तसवीर मुहब्बत की
जो साँसों में रहता है, जो पलकों में सोता है
वो प्यार जवानी में, इक बार ही होता है

Friday, October 3, 2008

आँखों में मस्ती शराब की
काली ज़ुल्फ़ों में आँहें शबाब की
जाने आई कहाँ से टूटके
मेरे दामन में पंखुड़ी गुलाब की

चांद का टुकड़ा कहूँ या, हुस्न की दुनिया कहूँ
प्रीत की सरगम कहूँ या, प्यार का सपना कहूँ
सोचता हूँ, क्या कहूँ, सोचता हूँ, क्या कहूँ
इस शोख़ को मैं क्या कहूँ

चाल कहती है न हो, पहली घटा बरसात की
हर अदा अपनी जगह, तारीफ़ हो किस बात की
आरज़ू कितने दिनों से, आरज़ू कितने दिनों से
थी हमें इस रात की
मिसाल इसकी कहाँ है ज़माने में
की सारे खोने के गम पाये हमने पाने में

वो शक्ल पिघली तो हर शै में ढल गई जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में

जो मुन्तजिर न मिला वो तो हम है शर्मिन्दा
की हमने देर लगा दी पलट के आने में

लतीफ था वो ताखैय्युल से, ख्वाब से नाज़ुक
गवा दिया हमने ही उसे आज़माने में

समझ लिया था कभी एक सराब को दरिया
पर एक सुकून था हमको फरेब खाने में

झुका दरख्त हवा से, तो आँधियों ने कहा
ज्यादा फर्क नहीं झुक के टूट जाने में
मैं भूल जाऊं अब यही मुनासिब है 
मगर भूलना भी चाहूँ तो किस तरह 
भूलूं की तुम तो फिर भी हकीक़त हो कोई ख्वाब नहीं
यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ
कमबख्त
भुला सका न ये सिलसिला जो था ही नहीं
वो इक ख़याल जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात जो मैं कह नहीं सका तुम से
वो एक रब्त 
वो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब
जो कभी हुआ ही नहीं
अगर ये हाल है दिल का तो कोई समझाए
तुम्हें भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूं
की तुम तो फिर भी हकीक़त हो कोई ख्वाब नही
दर्द अपनाता है पराए कौन
कौन सुनता है और सुनाए कौन

कौन दोहराए वो पुरानी बात
गम अभी सोया है जगाए कौन

वो जो अपने हैं क्या वो अपने हैं कौन
दुःख झेले आज़माए कौन

अब सुकून है तो भूलने में है
लेकिन उस शख्स को भुलाए कौन

आज फिर दिल है कुछ उदास उदास
देखिये आज याद आए कौन
अपना गम लेके कहीं और न जाया जाए
घर में बिखरी हुई चीजों को सजाया जाए

जिन चिरागों को हवाओं का कोई खौफ नहीं
उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाए

बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उडाया जाए

खुदकुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन यूं ही औरों को सताया जाए

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए
अब खुशी है न कोई गम रुलाने वाला  
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला
 
उस को रुखसत तो किया था मुझे मालूम न था  
सारा घर ले गया, घर छोड़ के जाने वाला  
 
इक मुसाफिर के सफर जैसी है सब की दुनिया  
कोई जल्दी में कोई देर से जाने वाला  

एक बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा-चेहरा  
जिस तरफ़ देखिये आने को है आने वाला
ऐ हुस्न-ए-बे-परवाह तुझे शबनम कहूँ शोला कहूँ
फूलों में भी शोख़ी तो है किसको मगर तुझसा कहूँ

गेसू उड़े महकी फ़ज़ा जादू करें आँखें तेरी
सोया हुआ मंज़र कहूँ या जागता सपना कहूँ

चन्दा की तू है चाँदनी लहरों की तू है रागिनी
जान-ए-तमन्ना मैं तुझे क्या क्या कहूँ क्या ना कहूँ
हवा चली थी कुछ ऐसी बिखर गये होते
रगों में ख़ून न होता तो मर गये होते

ये सर्द हवा ये आवारगी ये नींद का बोझ
हम अपने शहर में होते तो घर गये होते

हमीं ने रोक लिये अपने सर पे ये इल्ज़ाम
वगरना शहर में किस किस के सर गये होते

हमीं ने ज़ख़्म-ए-दिल-ओ-जाँ छिपा लिया वरना
न जाने कितनों के चेहरे उतर गये होते

सुकून-ए-दिल को न इस तरह तरसते हम
तेरे करम से जो बच कर गुज़र गये होते
हक़-ए-वफ़ा जो हम जताने लगे
आप कुछ कह के मुस्कुराने लगे

हमको जीना पड़ेगा फ़ुर्क़त में
वो अगर हिम्मत आज़माने लगे

डर है मेरी ज़ुबाँ न खुल जाये
अब वो बातें बहुत बताने लगे

जान बचती नज़र नहीं आती
ग़ैर उल्फ़त बहुत जताने लगे

तुमको करना पड़ेगा उज्र वफ़ा
हम अगर दर्द-ए-दिल सुनाने लगे

बहुत मुश्किल है शेवा-ए-तस्लीम
हम भी आख़िर को जी चुराने लगे

वक़्त-ए-रुख़्सत था सख़्त ''हाली'' पर
हम भी बैठे थे जब वो जाने लगे
हम कि ठहरे अजनबी इतनी मदारातों के बाद
फिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बाद

कब नज़र में आयेगी बेदाग़ सब्ज़े की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

थे बहुत बे-दर्द ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के
थीं बहुत बेसब्र सुबहें मेहरबाँ रातों के बाद

दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बाद

उनसे जो कहने गये थे 'फ़ैज़' जाँ-सदक़े किये
अनकही ही रह गई वो बात सब बातों के बाद
दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया
पूछने आते हो हर रोज़ असीरों के मिज़ाज
क्यूँ नहीं कहते हो जाओ तुम्हें आज़ाद किया

है दुआ याद मगर हर्फ़-ए-दुआ याद नहीं
मेरे नग्मात को अंदाज़-ए-नवा याद नहीं

ज़िंदगी ज़ब्र-ए-मुसलसल की तरह काटी है
जाने किस जुर्म की काटी है सज़ा याद नहीं

सिर्फ़ धुँधलाये सितारों की चमक देखी है
कब हुआ कौन हुआ मुझसे ख़फ़ा याद नहीं

आओ एक सजदा करें आलम-ए-मदहोशी में
लोग कहते हैं 'सागर' को ख़ुदा याद नहीं
ग़म नहीं जो तन से निकल दिल गया
मिल गये तुम मुझको सब कुछ मिल गया

दाग़-ए-ग़म रोज़-ए-अज़ल ही मिल गया
तन में जाँ आने से पहले दिल गया

ऐ निगाह-ए-यास तेरा हो बुरा
घर तलक रोता हुआ क़ातिल गया

मरहले तय कुंज-ए-उज़्लत में किये
बैठे बैठे सैकड़ों मंज़िल गया

आई जब सहरा में ख़ुश-चश्मों की याद
सामने नरगिस का तख़्ता खिल गया

वा-ए-क़िस्मत ग़ाफ़िल आया मैं 'अमीर'
उम्र भर ग़ाफ़िल रहा ग़ाफ़िल गया
दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला
वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला

क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उसके
वो जो इक शख्स है मुँह फेर के जाने वाला

मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख़ाब की ताबीर बताने वाला

तुम तकल्लुफ़ को भी इख़लास समझते हो 'फ़राज़'
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला
दिल मिला और ग़म शनाश मिला
फूल को आग का लिबास मिला

हर शनावर भँवर में डूबा था
जो सितारा मिला उदास मिला

मयकदे के सिवा हमारा पता
उनकी ज़ुल्फ़ों के आस पास मिला

आब-ए-हैवाँ की धूम थी 'साग़र'
सादा पानी का इक गिलास मिला
दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया

ये मैं सौ जाँ से तिरे तर्ज़-ए-तक़ल्लुम के निसार
फिर तो फ़र्माइये क्या आपने इरशाद किया

इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद
इसका ग़म है कि बहुत देर से बरबाद किया

इतना मानूस हूँ फ़ितरत से कली जब चटकी
झुक के मैंने ये कहा मुझसे कुछ इर्शाद किया

मेरी हर साँस है इस बात की शाहिद ऐ मौत
मैंने हर लुत्फ़ के मौक़े पे तुझे याद किया

मुझको तो होश नहीं तुमको ख़बर हो शायद
लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बरबाद किया

कुछ नहीं इसके सिवा 'जोश'  हरीफ़ों का कलाम
वस्ल ने शाद किया हिज्र ने ना-शाद किया
दरीचा बे-सदा कोई नहीं है
अगरचे बोलता कोई नहीं है

रुकूँ तो मंज़िलें हि मंज़िलें हैं
चलूँ तो रास्ता कोई नहीं है

खुली हैं खिड़कियाँ हर घर की लेकिन
गली में झाँकता कोई नहीं है

किसी से आश्ना ऐसा हुआ हूँ
मुझे पहचानता कोई नहीं है

मैं ऐसे जमघटे में खो गया हूँ
जहाँ मेरे सिवा कोई नहीं है
दर्द-ओ-ग़म का न रहा नाम तेरे आने से
दिल को क्या आ गया आराम तेरे आने से

शुक्र सद शुक्र के लबरेज़ हुआ ऐ साक़ी
मय-ए-इशरत से मेरा जाम तेरे आने से

सहर-ए-ईद ख़ज़िल जिससे हो ऐ माह-ए-लकाँ
वस्ल की भुली है ये शाम तेरे आने से


वो करें भी तो किन अल्फ़ाज़ में शिक़वा तेरा
जिनको तेरी निगह-ए-लुत्फ़ ने बरबाद किया
होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है

उनसे नज़रें क्या मिलीं रोशन फ़िज़ाएं हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है

खुलती ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शायरी
झुकती आँखों ने बताया मैकशी क्या चीज़ है

हम लबों से कह न पाए उनसे हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है
मोती हो तो बाँध के रख लूँ प्यार छुपाऊँ कैसे
वो चेहरा है हर चेहरे में उसे भुलाऊँ कैसे 

चाँद नहीं फूल नहीं कोई नहीं उन सा हसीं 
कौन हैं वो क्या नाम है उनका यहाँ बताऊँ कैसे

हो खोया हुआ है हर समाँ यार बिना सूना है जहाँ 
नील गगन के चाँद को बाँहों में ले आऊँ कैसे

ओ हो चाहे जिन्हें मेरी नज़र हाय नहीं उनको ख़बर 
बंद है मन्दिर का दरवाज़ा फूल चढ़ाऊँ कैसे
मुद्दतें बीत गईं तुम नहीं आये अब तक
रास्ता और दिखाओगे न जाने कब तक
जो भी मिलता है वो तुमसा ही नज़र आता है

दिल की तन्हाइयाँ बहलाती हैं यूँ भी ग़म को
जैसे सच मुच ही पुकारा हो तुम्हीं ने हमको
पास आते ही मगर ख़ाब बिखर जाता है

वो हसीं लम्हे जो कल तक थे मुरादों की तरह
आज पलकों पे चमक उठते हैं यादों की तरह
दर्द रह जाता है और वक़्त गुज़र जाता है

भेजते हो कभी गुल को तो कभी शबनम को
तुम कहाँ कैसे हो मालूम है हर मौसम को
चाँद हर शब को तुम्हारी ही ख़बर लाता है
मेरी निगाह छलकता हुआ है पैमाना
निगाह-ए-मय से पिलाऊँ बनाऊँ दीवाना

जो पीने आये हैं उनसे कहो मुझे देखें
मेरा ये शोख़ सरापा है एक मयख़ाना

हर एक नज़र में मेरे शबाब की मस्ती
जिसे भी देख ले मेरी अदा का मस्ताना

ये सारी गर्मी-ए-महफ़िल है मेरे ही दम से
जिसे हो जलना क़रीब आये बन के परवाना

जिधर भी जाऊँ उधर फैलती हैं ख़ुश्बूएं
जो मेरी पाये महक होश से हो बेगाना
लोग मुझे पागल कहते हैं गलियों में बाज़ारों में
मैंने प्यार किया है मुझको चुनवा दो दीवारों में

हर पनघट पर मेरे फ़साने चौपालों में ज़िक्र मेरा
मेरी ही बातें होती हैं बस्ती में चौबारों में

दुनिया वालो कुछ तो मुझको मेरी वफ़ा की दाद मिले
मैंने दिल के फूल के खिलाये शोलों में अंगारों में

गीत है या आहों का धुवाँ है नग़मा है या दिल की तड़प
इतना दर्द कहाँ से आया साज़ों की झंकारों में
जाने क्या हाल हो इस दिल का अगर तू आये
न तो जज़्बात पे न ख़ुद पे ही क़ाबू आये

चार-जानिब तेरी परचाई नज़र आती है
तू ही ख़ुश्बू सा महकता हुआ हर-सू आये

तेरे जलवे की निगाहों को नहीं ताब रही
ऐसा महसूस हुआ चाँद को हम छू आये

तेरी दिलदार निगाहों का दिलासा पा के
मेरी पलकों पे चमकते हुये जुगनू आये
दिल का लगाना खेल न जानो दिल का लगाना मुश्किल है
जिस पर दिल आ जाये उसको दिल से भुलाना मुश्किल है

दिल दीवाना जाने किसका रस्ता तकता रहता है
वो तो शायद था उसका लौट के आना मुश्किल है

पास था जब वो तन्हाई भी अक्सर अच्छी लगती थी
बिछड़ गये तो यूँ लगता है उसको भुलाना मुश्किल है

ग़ज़लों से गीतों से सबको बहलाना तो आसाँ है
हँस हँस कर लेकिन महफ़िल में दर्द को गाना मुश्किल है
आँखों को इंतज़ार का दे के हुनर चला गया
चाहा था एक शख्स को जाने किधर चला गया

दिन की वो महफ़िलें गईं रातों के रतजगे गये
कोई समेट कर मेरे शाम-ओ-सहर चला गया

झोंका है एक बहार का रंग-ए-ख़याल-ए-यार भी
हर-सू बिखर बिखर गई ख़ुश्बू जिधर चला गया

उसके ही दम से दिल में आज धूप भी चाँदनी भी है
दे के वो अपनी याद के शम्स-ओ-क़मर चला गया

कू-ब-कूचा दर-ब-दर कबसे भटक रहा है दिल
हमको भुला के राह वो अपनी डगर चला गया
आँचल में फूल चाँद सितारे सजा लिये
नैनों में मैंने आस के दीपक जला लिये

सुनते ही उनका नाम मेरा दिल धड़क उठा
कजरा लहक उठा मेरा गजरा महक उठा
दुनिया ने दिल के भेद निगाहों से पा लिये

करते हैं सब ही प्यार मगर इस कदर नहीं
हम उनके कब हुये ये हमें ख़ुद ख़बर नहीं
आँखों ने नींद छोड़ के सपने सजा लिये

जल्दी से इंतज़ार का मौसम तमाम हो
जी चाहता है आज ये जल्दी से शाम हो
इस बेक़रार दिल को कहाँ तक सम्भालिये

आँगन में मेरे प्यार की बारात आयेगी
था जिसका इंतज़ार वही रात आयेगी
ख़ाबों में ताजमहल वफ़ा के बना लिये

Aap To Aise Na The

खुदा ही जुदा करे तो करे,
कोई ताकत जुदा हमको नहीं कर पाएगी
कमसिन हो हसीना हो, वो हुस्न का चाहे नगीना हो
हो कोई सूरत जुदा हमको नहीं कर पाएगी, खुदा ही ...

हम खूबियों के भी आशिक़, हम गोरियाँ के भी शैदा
एक दूसरे के लिये ही, हमें रब ने किया जैसे पैदा
वो चाहे रखे अमीरी में, वो चाहे रखे फ़कीरी में
हो कोई हालत जुदा हमको नहीं कर पाएगी, खुदा ही ...

भूले से कोई परी जो, हम दोनों को भाने लगेगी
वो बीच में दो दिलों के, कभी दीवार बन ना सकेगी
हम तेरे लिये तो जहाँ छोड़ दें, परियाँ तो क्या हम जाँ छोड़ दें
हो पूरी जन्नत जुदा हमको नहीं कर पाएगी, खुदा ही ...

हमप्याला और हमनिवाला, हमराही हमराज़ हमदम
हम जो गिरें थामना तुम, तुम जो गिरो थामेंगे हम
तूफ़ान हो चाहे किनारा हो, एक दूसरे का सहारा हो
हो कोई आगत जुदा हमको नहीं कर पाएगी, खुदा ही ...
पहले भी जीते थे मगर जबसे मिली है ज़िंदगी
सीधी नहीं है दूर तक उलझी हुई है ज़िंदगी

अच्छी भली थी दूर से जब पास आई खो गई
जिसमें न आये कुछ नज़र वो रोशनी है ज़िंदगी

हर रास्ता अन्जान सा हर फलसफ़ा नादान सा
सदियों पुरानी है मगर हर दिन नई है ज़िंदगी

मिट्टी हवा बन कर उड़ी घूमी फिरी वापस मुड़ी
क़बरों पे क़तबों की तरह लिक्खी हुई है ज़िंदगी
लोग कहते हैं अजनबी तुम हो
अजनबी मेरी ज़िंदगी तुम हो

दिल किसी और का न हो पाया
आरज़ू मेरी आज भी तुम हो

मुझको अपना शरीक-ए-ग़म कर लो
यूँ अकेले बहुत दुखी तुम हो

दोस्तों से वफ़ा की उम्मीदें
किस ज़माने के आदमी तुम हो
कुछ दूर हमारे साथ चलो हम दिल की कहानी कह देंगे
समझे न जिसे तुम आँखों से वो बात ज़बानी कह देंगे

फूलों की तरह जब होंठों पर इक शोख़ तबस्सुम बिखरेगा
धीरे से तुम्हारे कानों में इक बात पुरानी कह देंगे

इज़हार-ए-वफ़ा तुम क्या समझो इक़रार-ए-वफ़ा तुम क्या जानो
हम ज़िक्र करेंगे ग़ैरों का और अपनी कहानी कह देंगे

मौसम तो बड़ा ही ज़ालिम है तूफ़ान उठाता रहता है
कुछ लोग मगर इस हलचल को बदमस्त जवानी कह देंगे
कहीं तारे कहीं शबनम कहीं जुगनू निकले
सारे मंज़र तेरी आवाज़ के जादू निकले

ज़िंदगी हम जिये औरों की ख़ुशी की ख़ातिर
भीड़ में हँस दिये तन्हाई में आँसू निकले

तेरे होंठों पे चमक उट्ठे मेरा नाम कभी
और मेरी ग़ज़लों के परदों से कभी तू निकले

जब भी याद आ गया वो साँवला चेहरा ''''''''राशिद''''''''
आँखों में फूल खिले साँसों से ख़ुश्बू निकले
जब रात की तन्हाई दिल बन के धड़कती है
यादों के दरीचे में चिलमन सी सरकती है

यूँ प्यार नहीं छुपता पलकों के झुकाने से
आँखों के लिफ़ाफ़ों में तहरीर चमकती है

ख़ुश-रंग परिंदों के लौट आने के दिन आये
बिछड़े हुये मिलते हैं जब बर्क पिघलती है

शोहरत की बुलन्दी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है

Aabshaar-E-Ghazal

दर्द दिल में उठा सोचते सोचते
या क्या आ गया सोचते सोचते

कौन था क्या था वो याद आता नहीं
याद आ जायेगा सोचते सोचते

राह में रह गई आने वाली सहर
बुझ गया हर दिया सोचते सोचते

अजनबी लोग हैं अजनबी रास्ते
मैं कहाँ आ गया सोचते सोचते

दूर हो कर न हम-तुम क़रीब आ सके
बढ़ गया फ़ासला सोचते सोचते
ये ज़िंदग़ी !
आज जो, तुम्हारे बदन की छोटी-बड़ी नसों में
मचल रही है, तुम्हारे पैरों से, चल रही है

ये ज़िंदग़ी !
तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से, निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में, ढल रही है

ये ज़िंदग़ी !
जाने कितनी सदियों से यूँही शक़लें
बदल रही है

बदलती शक़लें
बदलते जिस्मों में
चलता-फिरता ये इक शरारा
जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा
इसी से सारी शहल-पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा

सितारे तोड़ो, या घर बसाओ
क़लम उठाओ, या सर झुकाओ

तुम्हारी आँखों की रोश्नी तक
है खेल सारा

ये खेल होगा नहीं दुबारा!
ये खेल होगा नहीं दुबारा!
सफ़र में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो

किसीके वासते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो

यहाँ किसीको कोई रासता नहीं देता
मुझे गिराके अगर तुम सम्भल सको तो चलो

यही है ज़िंदगी, कुछ ख़ाक चंद उम्मीदें
इन्ही खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
ओ मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की, बिन चिठ्ठी बिन तार
छोटा करके देखिये, जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है, बाहों भर संसार

ए लेके तन के नाप को, घूमे बस्ती गाँव
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव
सबकी पूजा एक सी, अलग-वलग हर रीत
मस्जिद जाए मौल्वी, कोयल गाए गीत

पूजा घर में मूर्ती, मीर के संग श्याम
जिसकी जितनी चाकरी, उतने उसके दाम

सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक, भूका रहे फ़कीर
अच्छी संगत बैठकर, संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से, मीठी हो गई धूप

सपना झर्ना नींद का, जागी आँखें प्यास
पाना खोना खोजना, साँसों का इतिहास
चाहे गीता वाचिए, या पढ़िए क़ुरान
मेरा तेरा प्यार ही, हर पुस्तक का ज्ञान
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी

सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी

हर तरफ़ भागते दौड़ते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी

रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
ज: हर नयी दिन नया इंतज़ार आदमी

ज: ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र डर सफ़र
ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र डर सफ़र
आखिरी साँस तक बेक़रार आदमी
जवानी के हीले, हया के बहाने
ये मान के तुम मुझसे पर्दआ करोगी
ये दुनिया मगर तुझसी भोली नहीं है
छुपकर मुहब्बत को रुसवा करोगी

बड़ी कोशिशों से, बड़ी ख़्वाहिशों से
तमन्ना के सहमी हुई साज़िशोण से
मिलेगा जो मौका, तो बेचैन होकर
दरीचों से तुम मुझको देखा करोगी

सतायेगी जब चाँदनी की उदासी
दुखायेगी दिल फ़िज़ा की खमोशी
उफ़क़ की तरफ़ खाली नज़रें जमाकर
कभी जो न सोचा वो सोचा करोगी

कभी दिल की धड़कन महसूस होगी
कभी ठण्डी साँसोण के तूफ़ान उठेंगे
कभी गिर के बिस्तर पे आहें भरोगी
कभी झुक के तकिये पे रोया करोगी
शायद मैं ज़िंदगी की सहर लेके आ गया
कातिल को आज अपने ही घर लेके आ गया

ता-उम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क़ की
अंजाम ये कि गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया

नश्तर है मेरे हाथ में, कंधों पे मयक़दा
लो मैं इलाज-ए-दर्द-ए-जिग़र लेके आ गया

""फ़ाकिर"" सनमकदे में न आता मैं लौटकर
इक Zअख़्म भर गया था इधर लेके आ गया

Sath Sath

तुम को देखा तो ये ख़याल आया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया
तुम को...

आज फिर दिलने एक तमन्ना की - (२)
आज फिर दिलको हमने समझाया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया...

तुम चले जाओगे तो सोचेंगे - (२)
हमने क्या खोया, हमने क्या पाया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया...

हम जिसे गुनगुना नहीं सकते - (२)
वक़्त ने ऐसा गीत क्यूँ गाया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया...
धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो
ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटाकर देखो

वो सितारा चमकने दो यूँही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो

पत्थरों में भी ज़ुबां होती है, दिल होता है
अपने घर के दर-ओ-दीवार सजाकर देखो

फ़ासिला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या ना मिले हाथ बढ़ाकर देखो

Sajda

किस को क़ातिल मैं कहूँ किस को मसीहा समझूँ
सब यहाँ दोस्त ही बैठे हैं किसे क्या समझूँ

वो भी क्या दिन थे के हर वहम यकीन होता था
अब हक़ीकत नज़र आये तो उसे क्या समझूँ

दिल जो टूटा तो कई हाथ दुआ को उठे
ऐसे माहौल में अब किस को पराया समझूँ

ज़ुल्म ये है के है यक़्ता तेरी बेगानारवी
लुत्फ़ ये है के मैं अब तक तुझे अपना समझूँ