दिल ग़म से जल रहा है जले, पर धुआँ न हो
मुमकिन है इसके बाद कोई, इम्तेहां न हो
दुनिया तो क्या ख़ुदा से भी घबराके कह दिया
वह महर्बां नहीं तो कोई महर्बां न हो
लूटा ख़ुशी ने आग लगा दी बहार ने
बरबाद इस तरह भी किसी का जहाँ न हो
अब तो वहीं सुकूं मिलेगा मुझे जहाँ
ये संगदिल ज़मीं न हो, आस्मां न हो
दिल ग़म से जल रहा है जले, पर धुआँ न हो
Saturday, October 4, 2008
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