Thursday, November 27, 2008
Unknown
Tuesday, November 4, 2008
कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों है
वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों है
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है
यही होता है तो आख़िर यही होता क्यों है
एक ज़रा हाथ बढ़ा दे तो पकड़ लें दामन
उसके सीने में समा जाए हमारी धड़कन
इतनी क़ुर्बत है तो फिर फ़ासला इतना क्यों है
दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
एक लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई
आस जो टूट गई फिर से बंधाता क्यों है
तुम मसर्रत का कहो या इसे गम़ का रिश्ता
कहते है प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है
उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं
ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं
घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँखें मलते हैं
तमाम रात खजूरों के पेड़ जलते हैं
मैं शाह राह नहीं, रास्ते का पत्थर हूँ
यहाँ सवार भी पैदल उतर कर चलते हैं
उन्हें कभी न बताना मैं उनकी आँखें हूँ
वो लोग फूल समझकर मुझे मसलते हैं
ये एक पेड़ है, आ इस से मिलकर रो लें हम
यहाँ से तेरे मेरे रास्ते बदलते हैं
कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से
कहीं भी जाऊँ मेरे साथ साथ चलते हैं
कोई काँटा चुभा नहीं होता,
दिल अगर फूल सा नहीं होता,
मैं भी शायद बुरा नहीं होता
वो अगर बेवफ़ा नहीं होता
बेवफ़ा बेवफ़ा नहीं होता
ख़त्म ये फ़ासला नहीं होता
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता
जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता
रात का इंतज़ार कौन करे
आज-कल दिन में क्या नहीं होता
गुफ़्तगू उन से रोज़ होती है
मुद्दतों सामना नहीं होता
होठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते
साहिल पे समुंदर के ख़ज़ाने नहीं आते
पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी
आँखों को अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते
दिल उजड़ी हुई इक सराये की तरह है
अब लोग यहाँ रात जगाने नहीं आते
उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते
इस शहर के बादल तेरी ज़ुल्फ़ों की तरह हैं
ये आग लगाते हैं बुझाने नहीं आते
अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गये हैं
आते हैं मगर दिल को दुखाने नहीं आते
भूल शायद बहुत बड़ी कर ली
दिल ने दुनिया से दोस्ती कर ली
तुम मुहब्बत को खेल कहते हो
हम ने बर्बाद ज़िन्दगी कर ली
उस ने देखा बड़ी इनायत से
आँखों आँखों में बात भी कर ली
आशिक़ी में बहुत ज़रूरी है
बेवफ़ाई कभी कभी कर ली
हम नहीं जानते चिराग़ों ने
क्यों अंधेरों से दोस्ती कर ली
धड़कनें दफ़्न हो गई होंगी
दिल में दीवार क्यों खड़ी कर ली
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
किश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा
बेवक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा
जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं
तुमने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा
पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा
मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था
फिर इसके बाद मुझे कोई अजनबी न मिला
बहुत अजीब है ये क़ुर्बतों की दूरी भी
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला
ख़ुदा की इतनी बड़ी क़ायनात में मैंने
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वो ही न मिला
जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे
हज़ारों तरफ़ से निशाने लगे
हुई शाम यादों के इक गाँव में
परिंदे उदासी के आने लगे
घड़ी दो घड़ी मुझको पलकों पे रख
यहाँ आते आते ज़माने लगे
कभी बस्तियाँ दिल की यूँ भी बसीं
दुकानें खुलीं, कारख़ाने लगे
वहीं ज़र्द पत्तों का कालीन है
गुलों के जहाँ शामियाने लगे
पढाई लिखाई का मौसम कहाँ
किताबों में ख़त आने-जाने लगे
आँखों में रहा दिल में न उतरकर देखा,
कश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा
बेवक़्त अगर जाऊँगा, सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा
जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं,
तुमने मेरा काँटों-भरा बिस्तर नहीं देखा
पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
और जाम टूटेंगे इस शराब-ख़ाने में
मौसमों के आने में मौसमों के जाने में
हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती है दिल को दिल बनाने में
फ़ाख़्ता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकती
कौन साँप रहता है उसके आशियाने में
दूसरी कोई लड़की ज़िन्दगी में आयेगी
कितनी देर लगती है उसको भूल जाने में
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा ।
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा ।
हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ़ भी चल पड़ेगे, रास्ता हो जाएगा ।
कितना सच्चाई से, मुझसे ज़िंदगी ने कह दिया,
तू नहीं मेरा तो कोई, दूसरा हो जाएगा ।
मैं खूदा का नाम लेकर, पी रहा हूँ दोस्तो,
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा ।
सब उसी के हैं, हवा, ख़ुश्बु, ज़मीनो-आस्माँ,
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा ।
न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की
कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं
कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की
उजालों की परियाँ नहाने लगीं
नदी गुनगुनाई ख़यालात की
मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई
ज़ुबाँ सब समझते हैं जज़्बात की
सितारों को शायद ख़बर ही नहीं
मुसाफ़िर ने जाने कहाँ रात की
मुक़द्दर मेरे चश्म-ए-पुर'अब का
बरसती हुई रात बरसात की
एक चेहरा साथ साथ रहा जो मिला नहीं
किसको तलाश करते रहे कुछ पता नहीं
शिद्दत की धूप तेज़ हवाओं के बावजूद
मैं शाख़ से गिरा हूँ नज़र से गिरा नहीं
आख़िर ग़ज़ल का ताजमहल भी है मकबरा
हम ज़िन्दगी थे हमको किसी ने जिया नहीं
जिसकी मुखालफ़त हुई मशहूर हो गया
इन पत्थरों से कोई परिंदा गिरा नहीं
तारीकियों में और चमकती है दिल की धूप
सूरज तमाम रात यहां डूबता नहीं
किसने जलाई बस्तियाँ बाज़ार क्यों लुटे
मैं चाँद पर गया था मुझे कुछ पता नहीं
इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया
वर्ना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया
आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया
रोनेवालों से कह दो उनका भी रोना रोलें
जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया
तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था
तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया
एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें "फ़ाकिर"
हम को हर रोज़ के सदमात ने रोने न दिया
दिल की दीवार-ओ-दर पे क्या देखा
बस तेरा नाम ही लिखा देखा
तेरी आँखों में हमने क्या देखा
कभी क़ातिल कभी ख़ुदा देखा
अपनी सूरत लगी प्यारी सी
जब कभी हमने आईना देखा
हाय अंदाज़ तेरे रुकने का
वक़्त को भी रुका रुका देखा
तेरे जाने में और आने में
हमने सदियों का फ़ासला देखा
फिर न आया ख़याल जन्नत का
जब तेरे घर का रास्ता देखा
अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें
हम उनके लिए ज़िंदगानी लुटा दें
हर एक मोड़ पर हम ग़मों को सज़ा दें
चलो ज़िन्दगी को मोहब्बत बना दें
अगर ख़ुद को भूले तो, कुछ भी न भूले
कि चाहत में उनकी, ख़ुदा को भुला दें
कभी ग़म की आँधी, जिन्हें छू न पाये
वफ़ाओं के हम, वो नशेमन बना दें
क़यामत के दीवाने कहते हैं हमसे
चलो उनके चहरे से पर्दा हटा दें
सज़ा दें, सिला दें, बना दें, मिटा दें
मगर वो कोई फ़ैसला तो सुना दें
आज तुम से बिछड़ रहा हूँ
आज कहता हूँ फिर मिलूँगा तुम से
तुम मेरा इंतज़ार करती रहो
आज का ऐतबार करती रहो
लोग कहते हैं वक़्त चलता है
और इंसान भी बदलता है
काश रुक जाये वक़्त आज की रात
और बदले न कोई आज के बाद
वक़्त बदले ये दिल न बदलेगा
तुम से रिश्ता कभी न टूटेगा
तुम ही ख़ुश्बू हो मेरी साँसों की
तुम ही मंज़िल हो मेरे सपनों की
लोग बोते हैं प्यार के सपने
और सपने बिखर भी जाते हैं
एक एहसास ही तो है ये वफ़ा
और एहसास मर भी जाते हैं
आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है
ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है
जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है
अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी
अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूँ है
ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब "फ़ाकिर"
वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है
टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जितना-जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली
रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी
आँखें हँस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली
जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली
मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली
होंठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आँखों में, सादा सी जो बात मिली
पूछते हो तो सुनो, कैसे बसर होती है
रात खैरात की, सदके की सहर होती है
साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब
दिल ही दुखता है, न अब आस्तीं तर होती है
जैसे जागी हुई आँखों में, चुभें काँच के ख्वाब
रात इस तरह, दीवानों की बसर होती है
गम ही दुश्मन है मेरा गम ही को दिल ढूँढता है
एक लम्हे की ज़ुदाई भी अगर होती है
एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती खुशबू
कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है
दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ
बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है
काम आते हैं न आ सकते हैं बेज़ाँ अल्फ़ाज़
तर्ज़मा दर्द की खामोश नज़र होती है
आगाज़ तॊ होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वॊ नाम नहीं होता
जब जुल्फ़ की कालिख़ में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं हॊता
हँस हँस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकडे़
हर शख्स़ की किस्मत में ईनाम नहीं होता
बहते हुए आँसू ने आँखॊं से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाए वॊ जाम नहीं होता
दिन डूबे हैं या डूबे बारात लिये कश्ती
साहिल पर मगर कोई कोहराम नहीं होता
चाँद तन्हा है आसमां तन्हा,
दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा
बुझ गई आस छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुँआ तन्हा
जिंदगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा है और जान तन्हा
हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी,
दोनों चलते रहें तन्हा तन्हा
जलती बुझती सी रोशनी के परे,
सिमटा सिमटा सा एक मकां तन्हा
राह देखा करेगा सदियॊं तक
छॊड़ जाएगें ये जहाँ तन्हा
मेरी तन्हाई का ये अंधा शिगाफ़
ये के सांसों की तरह मेरे साथ चलता रहा
जो मेरी नब्ज़ की मानिन्द मेरे साथ जिया
जिसको आते हुए जाते हुए बेशुमार लम्हे
अपनी संगलाख़ उंगलियों से गहरा करते रहे, करते गये
किसी की ओक पा लेने को लहू बहता रहा
किसी को हम-नफ़स कहने की जुस्तुजू में रहा
कोई तो हो जो बेसाख़्ता इसको पहचाने
तड़प के पलटे, अचानक इसे पुकार उठे
मेरे हम-शाख़
मेरे हम-शाख़ मेरी उदासियों के हिस्सेदार
मेरे अधूरेपन के दोस्त
तमाम ज़ख्म जो तेरे हैं
मेरे दर्द तमाम
तेरी कराह का रिश्ता है मेरी आहों से
तू एक मस्जिद-ए-वीरां है, मैं तेरी अज़ान
अज़ान जो अपनी ही वीरानगी से टकरा कर
थकी छुपी हुई बेवा ज़मीं के दामन पर
पढ़े नमाज़ ख़ुदा जाने किसको सिज़दा करे
कुछ छोटे सपनो के बदले ,
बड़ी नींद का सौदा करने ,
निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे !
वही प्यास के अनगढ़ मोती ,
वही धूप की सुर्ख कहानी ,
वही आंख में घुटकर मरती ,
आंसू की खुद्दार जवानी ,
हर मोहरे की मूक विवशता ,चौसर के खाने क्या जाने
हार जीत तय करती है वे , आज कौन से घर ठहरेंगे .
निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे !
कुछ पलकों में बंद चांदनी ,
कुछ होठों में कैद तराने ,
मंजिल के गुमनाम भरोसे ,
सपनो के लाचार बहाने ,
जिनकी जिद के आगे सूरज, मोरपंख से छाया मांगे ,
उन के भी दुर्दम्य इरादे , वीणा के स्वर पर ठहरेंगे .
निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे
अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसू के संग होते हैं,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं,सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार-बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं,
जब ऊँच-नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।
जब पोथे खाली होते है, जब हर सवाली होते हैं,
जब गज़लें रास नही आती, अफ़साने गाली होते हैं,
जब बासी फीकी धूप समेटे दिन जल्दी ढल जता है,
जब सूरज का लश्कर चाहत से गलियों में देर से जाता है,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है,
जब कालेज से घर लाने वाली पहली बस छुट जाती है,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है,
जब लाख मन करने पर भी पारो पढ़ने आ जाती है,
जब अपना हर मनचाहा काम कोई लाचारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।
जब कमरे में सन्नाटे की आवाज़ सुनाई देती है,
जब दर्पण में आंखों के नीचे झाई दिखाई देती है,
जब बड़की भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,
क्या लिखते हो दिन भर, कुछ सपनों का भी सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हमें बुलाते है,हम जाते हैं,घबराते हैं,
जब साड़ी पहने एक लड़की का फोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमें मनाती हैं, फोटो दिखलाया जाता है,
जब सारे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।
दीदी कहती हैं उस पगली लडकी की कुछ औकात नहीं,
उसके दिल में भैया तेरे जैसे प्यारे जज़्बात नहीं,
वो पगली लड़की एक दिन मेरे लिए भूखी रहती है,
चुप चुप सारे व्रत करती है, मगर मुझसे कुछ ना कहती है,
जो पगली लडकी कहती है, हाँ प्यार तुझी से करती हूँ,
लेकिन मैं हूँ मजबूर बहुत, अम्मा-बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लड़की पर अपना कुछ अधिकार नहीं बाबा,
ये कथा-कहानी-किस्से हैं, कुछ भी सार नहीं बाबा,
बस उस पगली लडकी के संग जीना फुलवारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है |||
तुम अभी थे यहाँ, तुम अभी थे यहाँ
अभी साँसों की खुश्बू हवाओन में है
अभी कदमों की आहट फ़िज़ाओं में है
अभी शाखों पे है उंगलियों के निशाँ
तुम अभी थे यहाँ, तुम अभी थे यहाँ
आँख खुलते ही तुम ...
तुम जुदा होके भी मेरी राहों में हो
गर्म अश्कों में हो, सर्द आहों में हो
चाँदनी में झलकती हैं पर्छाइयाँ
तुम अभी थे यहाँ, तुम अभी थे यहाँ
आँख खुलते ही तुम ...
ऐसे ही कभी जब शाम ढले, तब याद हमें भी कर लेना
आँचल में सजा लेना कलियाँ
आया था यहाँ बेगाना सा
आया था यहाँ बेगाना सा, चल दूंगा कहीं दीवाना सा
चल दूंगा कहीं दीवाना सा
दीवाने की खातिर तुम कोई, इल्ज़ाम ना अपने सर लेना
ऐसे ही कभी जब शाम ढले, तब याद हमें भी कर लेना
आँचल में सजा लेना कलियाँ
रस्ता जो मिले अंजान कोई
रस्ता जो मिले अंजान कोई, आ जाए अगर तूफ़ान कोई
आ जाए अगर तूफ़ान कोई
अपने को अकेला जान के तुम
आँखों में न आंसू भर लेना
ऐसे ही कभी जब शाम ढले, तब याद हमें भी कर लेना
आँचल में सजा लेना कलियाँ
Wednesday, October 15, 2008
कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को
बस बदल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ
तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है
या मेरा दिल समझता है"
"मोहब्बत एक एहसासों की
पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था
कभी मीरा दीवानी थी
यहाँ सब लोग कहते है
मेरी आँखों में आंसू है
जो तू समझे तो मोती है
जो ना समझे तो पानी है"
"समंदर पीर के अंदर है
लेकिन रो नहीं सकता
ये आंसू प्यार का मोती है
इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू
बना लेना मगर सुनले
जो मेरा हो नहीं पाया
वो तेरा हो नहीं सकता "
भर्मर कोई कुमुदनी पर
मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब
पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे
सब किस्सा मोहब्बत का
हम किस्से को हकीक़त में
बदल बैठे तो हंगामा"
Tuesday, October 14, 2008
Monday, October 13, 2008
अब कहाँ आयेगा वो लौट के आने वाला
रेत पर छोड़ गया नक्श हजारों अपने
किसी पागल की तरह नक्श मिटाने वाला
सब्ज़ शाखें कभी ऐसे टू नहीं चीखती हैं
कौन आया है परिंदों को डराने वाला
आरिज़-ऐ-शाम की सुर्खी ने किया फाश उसे
परदा-ऐ-अब्र में था आग लगाने वाला
सफर-ऐ-शब का तकाजा है मेरे साथ रहो
दस्त पुर्हौल है तूफ़ान है आने वाला
मुझ को दर्पर्दा सुनाता रहा किस्सा अपना
अगले वक्तों की हिकायात सुनाने वाला
शबनमी घास घने फूल लाराज़ती किरणें
कौन आया है खजानों को लुटाने वाला
अब तो आराम करें सोचती आँखें मेरी
रात का आखिरी तारा भी है जाने वाला
गम देना मालूम है लेकिन गम की दवा मालूम नहीं
जिन की गली में उम्र गँवा दी जीवन भर हैरान रहे
पास भी आके पास न आए जान के भी अनजान रहे
कौन सी आख़िर की थी हमने ऎसी खता मालूम नहीं
ऐ मेरे पागल अरमानों झूठे बन्धन तोड़ भी दो
ऐ मेरी ज़ख्मी उम्मीदों दिल का दामन छोड़ भी दो
तुम को अभी इस नगरी में जीने की सज़ा मालूम नहीं
सन्नाटा ही गूंज रहा हो ऐसा भी हो सकता है
मेरा माझी मुझ से बिछड़ कर क्या जाने किस हाल में है
मेरी तरह वो भी तनहा हो ऐसा भी हो सकता है
सहारा सहारा कब तक मैं ढूंडूं उल्फत का एक आलम
आलम आलम इक सहारा हो ऐसा भी हो सकता है
अहल-ऐ-तूफ़ान सोच रहे हैं साहिल डूबा जाता है
ख़ुद उन का दिल दूब रहा हो ऐसा भी हो सकता है
अब तो मरने की दुआ दे जिंदगी ऐ जिंदगी
मैं तो अब उकता गया हूँ क्या यही है कायनात
बस ये आईना हटा दे जिंदगी ऐ जिंदगी
ढूडने े निकला था तुझ को और ख़ुद को खो दिया
तू ही अब मेरा पता दे जिंदगी ऐ जिंदगी
या मुझे एहसास की इस क़ैद से कर दे रिहा
वरना दीवाना बना दे जिंदगी ऐ जिंदगी
Wednesday, October 8, 2008
दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था
मुआफ़ कर ना सकी मेरी ज़िन्दगी मुझको
वो एक लम्हा कि मैं तुझसे तंग आया था
शगुफ़्ता फूल सिमट कर कली बने जैसे
कुछ इस तरह से तूने बदन चुराया था
गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह
अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था
पता नहीं कि मेरे बाद उनपे क्या गुज़री
मैं चाँद ख्वाब ज़माने में छोड़ आया था
जब मेरी राह तेरी राह से मिलती ही नहीं
फिर मेरा साथ निभाने की ज़रूरत क्या है
अपनी मासूम तमन्नाओं को रैबार ना बना
ख़्वाब फिर ख़्वाब हैं लबों की हक़ीकत क्या है
ये नई राह तुझे रास नहीं आएगी
मैने माना कि तुझे मुझसे मुहब्बत है मगर
मेरी गुर्बत तेरी चाहत का दिला क्या देगी
अपनी मेहरुमि-ए-किस्मत से परेशान हूँ मैं
बेबसी अश्क़-ए-नदामत के सिवा क्या देगी
वक़्त की धूप में हर चीज़ झुलस जएगी
तू मेरे साथ चल न पाएगी
ये आज़माइश ना बार होगी
मैं जानता हूँ मुझे खबर है
कि कल फ़ज़ा खुशगवार होगी
रहे मुहब्बत में ज़िन्दगी भर
रहेगी ये कशमकश बराबर
ना तुमको क़ुरबत में जीत होगी
ना मुझको फ़ुरक़त में हार होगी
हज़ार उल्फ़त सताये लेकिन
मेरे इरादों से है ये मुमकिन
अगर शराफ़त को तुमने छेड़ा
तो ज़िन्दगी तुम पे वार होगी
Tuesday, October 7, 2008
Saturday, October 4, 2008
मुमकिन है इसके बाद कोई, इम्तेहां न हो
दुनिया तो क्या ख़ुदा से भी घबराके कह दिया
वह महर्बां नहीं तो कोई महर्बां न हो
लूटा ख़ुशी ने आग लगा दी बहार ने
बरबाद इस तरह भी किसी का जहाँ न हो
अब तो वहीं सुकूं मिलेगा मुझे जहाँ
ये संगदिल ज़मीं न हो, आस्मां न हो
दिल ग़म से जल रहा है जले, पर धुआँ न हो
बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी
क्या ले के मिलें अब दुनिया से, आँसू के सिवा कुछ पास नहीं
या फूल ही फूल थे दामन में, या काँटों की भी आस नहीं
मतलब की दुनिया है सारी
बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी
वक़्त है महरबां, आरज़ू है जवां
फ़िक्र कल की करें, इतनी फ़ुर्सत कहाँ
दौर ये चलता रहे रंग उछलता रहे
रूप मचलता रहे, जाम बदलता रहे
रात भर महमाँ हैं बहारें यहाँ
रात गर ढल गयी फिर ये खुशियाँ कहाँ
पल भर की खुशियाँ हैं सारी
बढ़ने लगी बेक़रारी बढ़ने लगी बेक़रारी
अरे देखी ज़माने की यारी
बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी
उड़ जा उड़ जा प्यासे भँवरे, रस ना मिलेगा ख़ारों में
कागज़ के फूल जहाँ खिलते हैं, बैठ ना उन गुलज़ारो में
नादान तमन्ना रेती में, उम्मीद की कश्ती खेती है
इक हाथ से देती है दुनिया, सौ हाथों से लेती है
ये खेल है कब से जारी
बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी
थोडा सा समझौता जानम करना पड़ता है
कभी कभी कुछ इस हद तक बढ़ जाती है लाचारी
लगता है ये जीवन जैसे बोझ हो कोई भारी
दिल कहता है रोएँ लेकिन हंसना पड़ता है
कभी कभी इतनी धुंधली हो जाती हैं तस्वीरें
पता नहीं चलता कदमों में कितनी हैं जंजीरें
पाँव बंधे होते हैं लेकिन चलना पड़ता है
रूठ के जाने वाले बादल तू आने वाला तारा
किस को ख़बर किन लम्हों में बन जाए कौन सहारा
दुनिया जैसी भी हो रिश्ता रखना पड़ता है
आ तुझे आज हम मैकदे ले चलें
रात के नाम होंठों के सागर लिखें
अपनी आँखों में कुछ रात-जगे ले चलें
क्या हसीन लोग हैं
आँख आहों की हैं और लब पंख्ड़ी
इन की आराइश-ए-खल-ओ-ख़त के लिए
अपनी आँखों के हम आईने ले चलें
अजनबी चहरे में दोस्त बनाते नहीं
रिश्ते-नातों की चांदी बरसती नहीं
कुर्बतें सोहाबतें जिन की याद आयेंगी
ऐसे कुछ दोस्तों के पते ले चलें
उन की आँखों ने जलाते सुलगते हुए
मंज़रों के सिवा कुछ भी देखा नहीं
चेहरा-ए-अफ़सोस के सकिनों के लिए
फूल-ओ-खुश्बू सबा जाम-जामें ले चलें
जिंदगी तुझ से मिल कर ज़माना हुआ
फ़ासला प्यार में दोनों से मिटाया ना गया
वो घड़ी याद है जब तुम से मुलाक़ात हुई
एक इशारा हुआ दो हाथ बढ़े बात हुई
देखते देखते दिन ढल गया और रात हुई
वो समां आज तलक दिल से भुलाया ना गया
हम से आया न गया
क्या ख़बर थी के मिले हैं तो बिछड़ने के लिये
क़िस्मतें अपनी बनाईं हैं बिगड़ने के लिये
प्यार का बाग बसाया था उजड़ने के लिये
इस तरह उजड़ा के फिर हम से बसाया ना गया
हम से आया न गया
याद रग जाती है और वक़्त गुज़र जाता है
फूल खिलता है मगर खिल के बिखर जाता है
सब चले जाते हैं फिर दर्दे जिगर जाता है
दाग़ जो तूने दिया दिल ने मिटाया ना गया
हम से आया न गया ...
आखिर इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही, ये माजरा क्या है
मैं भी मुह में ज़ुबान रखता हूँ
काश पूछो की मुद्द क्या है
जबकि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है
ये परी-चेहरा लोग कैसे हैं
ग़मज़ा-ओ-उश्वा-ओ-अदा क्या है
शिकने-ज़ुलफ़े-अमबरी क्या है
निगाहे-चश्मे-सुरम सा क्या है
सब्ज़-ओ-गुल कहाँ से आये हैं
अब्र क्या चीज़ है, हवा क्या है
हमको उनसे वफ़ा कि है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
हाँ भला कर, तेरा भला होगा
और दरवेश की सदा क्या है
जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है
मैने माना कि कुछ नहीं ``ग़ालिब''
मुफ़्त हाथ आये, तो बुरा क्या है
ग़म की दुनिया से दिल भर गया
ढूँढ ले अब कोई घर नया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
चल जहाँ गम के मारे न हों
झूठी आशा के तारे न हों
झूठी आशा के तारे न हों
इन बहारों से क्या फ़ायदा
जिस में दिल की कली जल गई
ज़ख़्म फिर से हरा हो गया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
चार आँसू कोई रो दिया
फेर के मुँह कोई चल दिया
फेर के मुँह कोई चल दिया
लुट रहा था किसी का जहाँ
देखती रह गई ये ज़मीं
चुप रहा बेरहम आसमां
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
आज दोनों जहाँ हमारे हैं
सुबह का इंतेज़ार कौन करे
सुबह का इंतेज़ार कौन करे
फिर यह रुत यह समा मिले न मिले
आर्ज़ू का चमन खिले न खिले
वक़्त का ऐतबार कौन करे
सुबह का इंतेज़ार कौन करे
ले भी लो हम को अपनी बाहों में
रूह बेचैन है निगाहों में
इल्तेजा बार बार कौन करे
सुबह का इंतेज़ार कौन करे
नई रात ढलती जाती है
रूह ग़म से पिघलती जाती है
तेरी ज़ुल्फ़ों से प्यार कौन करे
अब तेरा इंतज़ार कौन करे
तुम को अपना बना के देख लिया
एक बार आज़मा के देख लिया
बार बार ऐतबार कौन करे
अब तेरा इंतज़ार कौन करे
ऐ दिल-ए-ज़ार सोग़वार न हो
उनकी चाहत में बेक़रार न हो
हाय, बदनसीबों से प्यार कौन करे
अब तेरा इंतज़ार कौन करे
फ़ासला भी, खो गया है, देखें किसको कौन मिलता है
जिसको जिसे मिलना है, हर हाल में मिलता है
दुनिया में मुहब्बत ही, किस्मत को बदलती है
ये शम्मा हवाओं में, बुझती नहीं जलती है
कुदरत ही बनाती है हर रिश्ता मुहब्बत का
यूँ भी कभी होता है, अनजान सी राहों में
हर रोज़ नहीं बनती तसवीर मुहब्बत की
जो साँसों में रहता है, जो पलकों में सोता है
वो प्यार जवानी में, इक बार ही होता है
Friday, October 3, 2008
काली ज़ुल्फ़ों में आँहें शबाब की
जाने आई कहाँ से टूटके
मेरे दामन में पंखुड़ी गुलाब की
चांद का टुकड़ा कहूँ या, हुस्न की दुनिया कहूँ
प्रीत की सरगम कहूँ या, प्यार का सपना कहूँ
सोचता हूँ, क्या कहूँ, सोचता हूँ, क्या कहूँ
इस शोख़ को मैं क्या कहूँ
चाल कहती है न हो, पहली घटा बरसात की
हर अदा अपनी जगह, तारीफ़ हो किस बात की
आरज़ू कितने दिनों से, आरज़ू कितने दिनों से
थी हमें इस रात की
रगों में ख़ून न होता तो मर गये होते
ये सर्द हवा ये आवारगी ये नींद का बोझ
हम अपने शहर में होते तो घर गये होते
हमीं ने रोक लिये अपने सर पे ये इल्ज़ाम
वगरना शहर में किस किस के सर गये होते
हमीं ने ज़ख़्म-ए-दिल-ओ-जाँ छिपा लिया वरना
न जाने कितनों के चेहरे उतर गये होते
सुकून-ए-दिल को न इस तरह तरसते हम
तेरे करम से जो बच कर गुज़र गये होते
आप कुछ कह के मुस्कुराने लगे
हमको जीना पड़ेगा फ़ुर्क़त में
वो अगर हिम्मत आज़माने लगे
डर है मेरी ज़ुबाँ न खुल जाये
अब वो बातें बहुत बताने लगे
जान बचती नज़र नहीं आती
ग़ैर उल्फ़त बहुत जताने लगे
तुमको करना पड़ेगा उज्र वफ़ा
हम अगर दर्द-ए-दिल सुनाने लगे
बहुत मुश्किल है शेवा-ए-तस्लीम
हम भी आख़िर को जी चुराने लगे
वक़्त-ए-रुख़्सत था सख़्त ''हाली'' पर
हम भी बैठे थे जब वो जाने लगे
फिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बाद
कब नज़र में आयेगी बेदाग़ सब्ज़े की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद
थे बहुत बे-दर्द ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के
थीं बहुत बेसब्र सुबहें मेहरबाँ रातों के बाद
दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बाद
उनसे जो कहने गये थे 'फ़ैज़' जाँ-सदक़े किये
अनकही ही रह गई वो बात सब बातों के बाद
जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया
पूछने आते हो हर रोज़ असीरों के मिज़ाज
क्यूँ नहीं कहते हो जाओ तुम्हें आज़ाद किया
है दुआ याद मगर हर्फ़-ए-दुआ याद नहीं
मेरे नग्मात को अंदाज़-ए-नवा याद नहीं
ज़िंदगी ज़ब्र-ए-मुसलसल की तरह काटी है
जाने किस जुर्म की काटी है सज़ा याद नहीं
सिर्फ़ धुँधलाये सितारों की चमक देखी है
कब हुआ कौन हुआ मुझसे ख़फ़ा याद नहीं
आओ एक सजदा करें आलम-ए-मदहोशी में
लोग कहते हैं 'सागर' को ख़ुदा याद नहीं
मिल गये तुम मुझको सब कुछ मिल गया
दाग़-ए-ग़म रोज़-ए-अज़ल ही मिल गया
तन में जाँ आने से पहले दिल गया
ऐ निगाह-ए-यास तेरा हो बुरा
घर तलक रोता हुआ क़ातिल गया
मरहले तय कुंज-ए-उज़्लत में किये
बैठे बैठे सैकड़ों मंज़िल गया
आई जब सहरा में ख़ुश-चश्मों की याद
सामने नरगिस का तख़्ता खिल गया
वा-ए-क़िस्मत ग़ाफ़िल आया मैं 'अमीर'
उम्र भर ग़ाफ़िल रहा ग़ाफ़िल गया
जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया
ये मैं सौ जाँ से तिरे तर्ज़-ए-तक़ल्लुम के निसार
फिर तो फ़र्माइये क्या आपने इरशाद किया
इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद
इसका ग़म है कि बहुत देर से बरबाद किया
इतना मानूस हूँ फ़ितरत से कली जब चटकी
झुक के मैंने ये कहा मुझसे कुछ इर्शाद किया
मेरी हर साँस है इस बात की शाहिद ऐ मौत
मैंने हर लुत्फ़ के मौक़े पे तुझे याद किया
मुझको तो होश नहीं तुमको ख़बर हो शायद
लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बरबाद किया
कुछ नहीं इसके सिवा 'जोश' हरीफ़ों का कलाम
वस्ल ने शाद किया हिज्र ने ना-शाद किया
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
उनसे नज़रें क्या मिलीं रोशन फ़िज़ाएं हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है
खुलती ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शायरी
झुकती आँखों ने बताया मैकशी क्या चीज़ है
हम लबों से कह न पाए उनसे हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है
वो चेहरा है हर चेहरे में उसे भुलाऊँ कैसे
चाँद नहीं फूल नहीं कोई नहीं उन सा हसीं
कौन हैं वो क्या नाम है उनका यहाँ बताऊँ कैसे
हो खोया हुआ है हर समाँ यार बिना सूना है जहाँ
नील गगन के चाँद को बाँहों में ले आऊँ कैसे
ओ हो चाहे जिन्हें मेरी नज़र हाय नहीं उनको ख़बर
बंद है मन्दिर का दरवाज़ा फूल चढ़ाऊँ कैसे
रास्ता और दिखाओगे न जाने कब तक
जो भी मिलता है वो तुमसा ही नज़र आता है
दिल की तन्हाइयाँ बहलाती हैं यूँ भी ग़म को
जैसे सच मुच ही पुकारा हो तुम्हीं ने हमको
पास आते ही मगर ख़ाब बिखर जाता है
वो हसीं लम्हे जो कल तक थे मुरादों की तरह
आज पलकों पे चमक उठते हैं यादों की तरह
दर्द रह जाता है और वक़्त गुज़र जाता है
भेजते हो कभी गुल को तो कभी शबनम को
तुम कहाँ कैसे हो मालूम है हर मौसम को
चाँद हर शब को तुम्हारी ही ख़बर लाता है
निगाह-ए-मय से पिलाऊँ बनाऊँ दीवाना
जो पीने आये हैं उनसे कहो मुझे देखें
मेरा ये शोख़ सरापा है एक मयख़ाना
हर एक नज़र में मेरे शबाब की मस्ती
जिसे भी देख ले मेरी अदा का मस्ताना
ये सारी गर्मी-ए-महफ़िल है मेरे ही दम से
जिसे हो जलना क़रीब आये बन के परवाना
जिधर भी जाऊँ उधर फैलती हैं ख़ुश्बूएं
जो मेरी पाये महक होश से हो बेगाना
मैंने प्यार किया है मुझको चुनवा दो दीवारों में
हर पनघट पर मेरे फ़साने चौपालों में ज़िक्र मेरा
मेरी ही बातें होती हैं बस्ती में चौबारों में
दुनिया वालो कुछ तो मुझको मेरी वफ़ा की दाद मिले
मैंने दिल के फूल के खिलाये शोलों में अंगारों में
गीत है या आहों का धुवाँ है नग़मा है या दिल की तड़प
इतना दर्द कहाँ से आया साज़ों की झंकारों में
जिस पर दिल आ जाये उसको दिल से भुलाना मुश्किल है
दिल दीवाना जाने किसका रस्ता तकता रहता है
वो तो शायद था उसका लौट के आना मुश्किल है
पास था जब वो तन्हाई भी अक्सर अच्छी लगती थी
बिछड़ गये तो यूँ लगता है उसको भुलाना मुश्किल है
ग़ज़लों से गीतों से सबको बहलाना तो आसाँ है
हँस हँस कर लेकिन महफ़िल में दर्द को गाना मुश्किल है
चाहा था एक शख्स को जाने किधर चला गया
दिन की वो महफ़िलें गईं रातों के रतजगे गये
कोई समेट कर मेरे शाम-ओ-सहर चला गया
झोंका है एक बहार का रंग-ए-ख़याल-ए-यार भी
हर-सू बिखर बिखर गई ख़ुश्बू जिधर चला गया
उसके ही दम से दिल में आज धूप भी चाँदनी भी है
दे के वो अपनी याद के शम्स-ओ-क़मर चला गया
कू-ब-कूचा दर-ब-दर कबसे भटक रहा है दिल
हमको भुला के राह वो अपनी डगर चला गया
नैनों में मैंने आस के दीपक जला लिये
सुनते ही उनका नाम मेरा दिल धड़क उठा
कजरा लहक उठा मेरा गजरा महक उठा
दुनिया ने दिल के भेद निगाहों से पा लिये
करते हैं सब ही प्यार मगर इस कदर नहीं
हम उनके कब हुये ये हमें ख़ुद ख़बर नहीं
आँखों ने नींद छोड़ के सपने सजा लिये
जल्दी से इंतज़ार का मौसम तमाम हो
जी चाहता है आज ये जल्दी से शाम हो
इस बेक़रार दिल को कहाँ तक सम्भालिये
आँगन में मेरे प्यार की बारात आयेगी
था जिसका इंतज़ार वही रात आयेगी
ख़ाबों में ताजमहल वफ़ा के बना लिये
Aap To Aise Na The
कोई ताकत जुदा हमको नहीं कर पाएगी
कमसिन हो हसीना हो, वो हुस्न का चाहे नगीना हो
हो कोई सूरत जुदा हमको नहीं कर पाएगी, खुदा ही ...
हम खूबियों के भी आशिक़, हम गोरियाँ के भी शैदा
एक दूसरे के लिये ही, हमें रब ने किया जैसे पैदा
वो चाहे रखे अमीरी में, वो चाहे रखे फ़कीरी में
हो कोई हालत जुदा हमको नहीं कर पाएगी, खुदा ही ...
भूले से कोई परी जो, हम दोनों को भाने लगेगी
वो बीच में दो दिलों के, कभी दीवार बन ना सकेगी
हम तेरे लिये तो जहाँ छोड़ दें, परियाँ तो क्या हम जाँ छोड़ दें
हो पूरी जन्नत जुदा हमको नहीं कर पाएगी, खुदा ही ...
हमप्याला और हमनिवाला, हमराही हमराज़ हमदम
हम जो गिरें थामना तुम, तुम जो गिरो थामेंगे हम
तूफ़ान हो चाहे किनारा हो, एक दूसरे का सहारा हो
हो कोई आगत जुदा हमको नहीं कर पाएगी, खुदा ही ...
सीधी नहीं है दूर तक उलझी हुई है ज़िंदगी
अच्छी भली थी दूर से जब पास आई खो गई
जिसमें न आये कुछ नज़र वो रोशनी है ज़िंदगी
हर रास्ता अन्जान सा हर फलसफ़ा नादान सा
सदियों पुरानी है मगर हर दिन नई है ज़िंदगी
मिट्टी हवा बन कर उड़ी घूमी फिरी वापस मुड़ी
क़बरों पे क़तबों की तरह लिक्खी हुई है ज़िंदगी
समझे न जिसे तुम आँखों से वो बात ज़बानी कह देंगे
फूलों की तरह जब होंठों पर इक शोख़ तबस्सुम बिखरेगा
धीरे से तुम्हारे कानों में इक बात पुरानी कह देंगे
इज़हार-ए-वफ़ा तुम क्या समझो इक़रार-ए-वफ़ा तुम क्या जानो
हम ज़िक्र करेंगे ग़ैरों का और अपनी कहानी कह देंगे
मौसम तो बड़ा ही ज़ालिम है तूफ़ान उठाता रहता है
कुछ लोग मगर इस हलचल को बदमस्त जवानी कह देंगे
सारे मंज़र तेरी आवाज़ के जादू निकले
ज़िंदगी हम जिये औरों की ख़ुशी की ख़ातिर
भीड़ में हँस दिये तन्हाई में आँसू निकले
तेरे होंठों पे चमक उट्ठे मेरा नाम कभी
और मेरी ग़ज़लों के परदों से कभी तू निकले
जब भी याद आ गया वो साँवला चेहरा ''''''''राशिद''''''''
आँखों में फूल खिले साँसों से ख़ुश्बू निकले
Aabshaar-E-Ghazal
या क्या आ गया सोचते सोचते
कौन था क्या था वो याद आता नहीं
याद आ जायेगा सोचते सोचते
राह में रह गई आने वाली सहर
बुझ गया हर दिया सोचते सोचते
अजनबी लोग हैं अजनबी रास्ते
मैं कहाँ आ गया सोचते सोचते
दूर हो कर न हम-तुम क़रीब आ सके
बढ़ गया फ़ासला सोचते सोचते
आज जो, तुम्हारे बदन की छोटी-बड़ी नसों में
मचल रही है, तुम्हारे पैरों से, चल रही है
ये ज़िंदग़ी !
तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से, निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में, ढल रही है
ये ज़िंदग़ी !
जाने कितनी सदियों से यूँही शक़लें
बदल रही है
बदलती शक़लें
बदलते जिस्मों में
चलता-फिरता ये इक शरारा
जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा
इसी से सारी शहल-पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा
सितारे तोड़ो, या घर बसाओ
क़लम उठाओ, या सर झुकाओ
तुम्हारी आँखों की रोश्नी तक
है खेल सारा
ये खेल होगा नहीं दुबारा!
ये खेल होगा नहीं दुबारा!
